
कसावा की खेती खेती में लगातार हो रहे बदलाव और मौसम की मार को देखते हुए कृषि क्षेत्र में कई नए काम किए जा रहे हैं. ऐसे में अब कृषि वैज्ञानिक भी खेती में अधिक उपज के लिए फसलों की नई किस्मों को तैयार कर रहे हैं, जो कम पानी, गर्मी पाला या अन्य चुनौतियों में भी अच्छा उत्पादन दे सकें. इसी दिशा में ICAR केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान, केरल ने शकरकंद की तरह दिखने वाले कसावा की एक नई और उन्नत किस्म को विकसित किया है. इस किस्म का नाम 'श्री अन्नम' है. ये किस्म न सिर्फ उच्च उपज देने वाली है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेलने में भी सक्षम है. ऐसे में आइए जानते हैं इसकी खासियत क्या-क्या है.
ICAR द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 'श्री अन्नम' कसावा समय पर बुवाई और सिंचित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त किस्म है, जो कि बुवाई के करीब 9 से 10 महीनों में पककर तैयार हो जाता है. बात करें इस किस्म से होने वाली पैदावार की तो, किसान इस किस्म से प्रति हेक्टेयर औसतन 30 से 40 क्विंटल तक पैदावार ले सकते हैं. इसके साथ ही कसावा की इस किस्म की खासियत यह है कि ये कैरोटीन से भरपूर होता है जो सूखे में भी अच्छा उत्पादन देता है. वहीं, इस किस्म के फल मीठा और स्वादिष्ट होते हैं.

कसावा कंद वाली एक फसल है, जिसकी जड़ें स्टार्च से भरपूर होती हैं. कसावा की बनावट शकरकंद की तरह होती है, लेकिन इसकी लंबाई ज्यादा होती है. जमीन में उगने वाली इस फसल से भरपूर मात्रा में स्टार्च पाया जाता है, जिससे साबूदाना बनाने के लिए गूदा तैयार किया जाता है. वहीं, इसकी खेती ज्यादातर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में बड़े पैमाने पर की जाती है.
कंद वाली फसलों की तरह कसावा की खेती भी इसकी जड़ों की रोपाई करके ही की जाती है. वैसे तो हर तरह की जलवायु और मिट्टी में इसकी खेती कर सकते हैं. समतल से लेकर ढलान वाले स्थानों तक इसकी खेती करना बेहद आसान है, लेकिन खेत में जल निकासी का इंतजाम होना चाहिए. इसके अलावा इसकी खेती कम पानी और बिना उपजाऊ मिट्टी में भी आसानी से की जा सकती है.
साबूदाना बनाने के अलावा कसावा का इस्तेमाल पशुओं के चारे के तौर पर किया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, इसके सेवन से पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बनता है और दूध देने की छमता बढ़ जाती है. बता दें कि कंद वाले फसलों की तरह कसावा की खेती की भी जड़ों की रोपाई करके ही किया जाता है. भारत में व्रत-उपवास और कई इलाकों में साबूदाने का सेवन बड़े पैमाने पर किया जाता है, इसलिए किसानों को कसावा की खेती एक मुनाफे का सौदा साबित हो सकता है.
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