सिंचाई की चिंता दूर करेगा हाइड्रोजेलभारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस साल अल नीनो के चलते कम बारिश की आशंका जताई है, जिसने हमारे किसान भाइयों की चिंता बढ़ा दी है. सच तो यह है कि देश में जिस तरह जल संकट गहरा रहा है, उसने खेती के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. आज कई राज्यों में सिंचाई के लिए पानी की भारी किल्लत है और कई जिले तो 'डार्क जोन' बन चुके हैं, जहां जमीन से पानी निकालना भी बेहद मुश्किल हो गया है.
आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश की लगभग 60 प्रतिशत खेती ऐसे इलाकों में होती है जहां पानी की भारी कमी है, और इनमें से 30 प्रतिशत जगहों पर तो जरूरत के मुताबिक बारिश तक नहीं होती. भारत में इस्तेमाल होने वाले कुल पानी का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा अकेले खेती में ही खर्च होता है. ऐसे में पानी की हर एक बूंद का सही इस्तेमाल करना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि अगर हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में खेती करना नामुमकिन हो जाएगा. लेकिन इस गंभीर समस्या के बीच देश के कृषि वैज्ञानिकों ने एक बेहतरीन समाधान खोज निकाला है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने एक ऐसी आधुनिक तकनीक विकसित की है, जिसे 'हाइड्रोजेल' कहा जाता है. इसके इस्तेमाल से फसलों में सिंचाई की जरूरत बहुत कम हो जाती है और किसान भाई कम पानी में भी बंपर पैदावार ले सकते हैं.
हाइड्रोजेल बारीक दानों जैसा दिखने वाला एक अनोखा पदार्थ है, जिसे वैज्ञानिकों ने ग्वार फली से तैयार किया है. यह पूरी तरह प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल है, जिससे मिट्टी या पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पानी में घुलता नहीं, बल्कि उसे अपने अंदर सोख लेता है. खेतों में यह बिल्कुल एक 'वॉटर बैंक' की तरह काम करता है. जब किसान बुवाई के समय इसे मिट्टी में मिलाते हैं, तो पहली सिंचाई या बारिश का पानी मिलते ही ये दाने मात्र 10 मिनट में फूलकर 'जेल' बन जाते हैं. यह जेल पौधों की जड़ों से चिपक जाता है.
इसके बाद, जब तेज गर्मी या सूखे के कारण मिट्टी सूखने लगती है, तब पौधे अपनी जरूरत के हिसाब से इस जेल से पानी लेते रहते हैं. तेज धूप में भी यह पानी भाप बनकर उड़ता नहीं है. सबसे अच्छी बात यह है कि दोबारा बारिश या सिंचाई होने पर यह जैल फिर से पानी सोख लेता है. यह चक्र लगातार चलता रहता है और खेतों में नमी बनी रहती है.
अगर कोई किसान इसका इस्तेमाल करना चाहता है, तो यह जेब पर बिल्कुल भारी नहीं पड़ता. एक एकड़ खेत के लिए महज 1 किलोग्राम पूसा हाइड्रोजेल की जरूरत होती है, जिसकी कीमत लगभग 1000 से 1200 रुपये आती है. इसे इस्तेमाल करना भी बेहद आसान है. फसल की बुवाई के वक्त ही इसे बीज या सूखी खाद के साथ मिलाकर खेतों में डाल दिया जाता है. 1200 रुपये का यह छोटा सा निवेश किसानों को बार-बार सिंचाई करने के भारी-भरकम खर्च और डीजल-बिजली के बिल से बचा लेता है.
आमतौर पर किसानों के मन में यह सवाल उठता है कि इसे खेत में कब-कब डालना पड़ेगा? वैज्ञानिकों के मुताबिक, खेत में सिर्फ एक बार डालने के बाद यह हाइड्रोजेल मिट्टी में दो से लेकर पांच साल तक सक्रिय रहता है. यह बिना थके मिट्टी के अंदर लगातार पानी सोखने और छोड़ने का काम करता रहता है. समय पूरा होने पर यह मिट्टी में अपने आप गलकर खत्म हो जाता है, इसलिए इसे हर साल डालने की जरूरत नहीं है. जब दो से तीन साल का फसल चक्र पूरा हो जाए, या लगे कि खेतों में नमी रुकना कम हो गई है, तब इसे दोबारा डालना चाहिए.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में कई फसलों पर इसका कड़ा परीक्षण किया है. इसके इस्तेमाल से न सिर्फ पानी की 40 से 50% तक बचत होती है, बल्कि फसलों की गुणवत्ता और पैदावार भी बढ़ती है. यह तकनीक मुख्य रूप से धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, सरसों जैसी अनाज और नकदी फसलों के साथ-साथ आलू, टमाटर, प्याज, गोभी, गाजर, हल्दी और दालों के लिए बेहद लाभकारी पाई गई है.
विशेषकर गन्ना, धान और आलू जैसी फसलें जिन्हें बहुत ज्यादा पानी चाहिए, उनमें हाइड्रोजेल का प्रदर्शन क्रांतिकारी रहा है. सिंचाई के पानी की कमी निश्चित रूप से एक गंभीर समस्या है, लेकिन आधुनिक विज्ञान के पास इसका यह ठोस समाधान मौजूद है. जरूरत बस इस बात की है कि हमारे किसान भाई पुरानी कसी-कसाई लीक को छोड़ें और वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई इस कमाल की तकनीक को अपनाएं. जब आप जागरूक होकर पूसा हाइड्रोजेल का चुनाव करेंगे, तो कम पानी और कम लागत में भी आपकी फसलें लहलहाएंगी, जिससे देश का जलस्तर भी बचेगा और आपकी जेब में मुनाफा भी बढ़ेगा.
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