बोनस के लालच में बदल रही भारत में खेती की तस्वीर (फोटो- AI जनेरेटेड)हाल ही में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने "धान देश पर बोझ है" जैसे बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है. केंद्र सरकार और नीति आयोग के कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास जरूरत से कहीं अधिक चावल का भंडार है, जिसे बनाए रखना आर्थिक रूप से बोझ बन रहा है. दूसरी ओर, राज्य सरकारें इसे किसानों की अस्मिता से जोड़ रही हैं. असली संकट यह है कि 'बोनस' की राजनीति ने किसानों को केवल धान उगाने के लिए प्रेरित कर दिया है, जिससे फसल विविधीकरण (Crop Diversification) का सपना दम तोड़ रहा है.
दक्षिण भारत में तेलंगाना कभी दलहन और मोटे अनाजों का गढ़ था. लेकिन राज्य सरकार द्वारा धान पर भारी प्रोत्साहन और बोनस के कारण वहां का परिदृश्य बदल गया. आज तेलंगाना के किसान अन्य फसलों को छोड़कर केवल धान की ओर भाग रहे हैं क्योंकि वहां निश्चित खरीद और बोनस की गारंटी है. यही हाल छत्तीसगढ़ का है, जहां धान पर मिलने वाले भारी बोनस ने उसे 'धान का कटोरा' तो बनाए रखा, लेकिन वहां से दलहन और तिलहन गायब होते जा रहे हैं. जब बोनस केवल एक फसल पर मिलता है, तो किसान जोखिम क्यों उठाएगा?
मध्य प्रदेश, जिसे कभी सोयाबीन राज्य कहा जाता था, अब वहां भी बोनस और समर्थन मूल्य के कारण किसान गेहूं और धान की ओर झुक रहे हैं. पंजाब और हरियाणा का उदाहरण हमारे सामने है, जहां धान की खेती ने भूजल स्तर को पाताल तक पहुंचा दिया है. डेटा बताता है कि पंजाब में हर साल भूजल स्तर में 0.5 से 1 मीटर की गिरावट आ रही है. राजस्थान जैसे शुष्क राज्यों में भी, जहां बाजरा और तिलहन की प्रधानता होनी चाहिए थी, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ धान उगाने की होड़ मच गई है, जो भविष्य में रेगिस्तान के लिए जल संकट खड़ा कर देगी.
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अकसर वैज्ञानिकों और अधिकारियों के साथ बैठकों में दलहन और तिलहन में 'आत्मनिर्भर' बनने की बात करते हैं. सरकार 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन' के तहत अरबों रुपये खर्च कर रही है. लेकिन विडंबना देखिए कि एक तरफ सरकार चाहती है कि किसान दालें उगाएं, लेकिन दूसरी तरफ चुनाव आते ही भाजपा और विपक्षी दलों की राज्य सरकारें केवल धान पर बोनस की घोषणा करती हैं. तिलहन और दलहन पर न तो वैसी खरीद की व्यवस्था है और न ही बोनस का लालच है. यह नीतिगत विरोधाभास खेती को तबाह कर रहा है.
अगर बोनस की यह 'वोट नीति' जारी रही, तो इसके परिणाम खतरनाक होंगे, क्योंकि भारत आज भी अपनी जरूरत का लगभग 55% से 60% खाद्य तेल आयात करता है. दलहन का आयात भी बढ़ रहा है, वहीं एक ही फसल धान बार-बार उगाने से मिट्टी के पोषक तत्व खत्म हो रहे हैं. दूसरी तरफ 1 किलो चावल उगाने के लिए लगभग 3000 से 5000 लीटर पानी की खपत होती है. बोनस के लालच में हम अपना कीमती पानी 'निर्यात' कर रहे हैं और बाजार असंतुलन से सरकारी गोदामों में धान सड़ रहा है, जबकि बाजार में दालों की कीमतें आसमान छू रही हैं.
दक्षिण भारत में तेलंगाना कभी दलहन और मोटे अनाजों का गढ़ था. लेकिन राज्य सरकार द्वारा धान पर भारी प्रोत्साहन और बोनस के कारण वहां का परिदृश्य बदल गया. आज तेलंगाना के किसान अन्य फसलों को छोड़कर केवल धान की ओर भाग रहे हैं, क्योंकि वहां निश्चित खरीद और बोनस की गारंटी है. यही हाल छत्तीसगढ़ का है, जहां धान पर मिलने वाले भारी बोनस ने उसे 'धान का कटोरा' तो बनाए रखा, लेकिन वहां से दलहन और तिलहन गायब होते जा रहे हैं. जब बोनस केवल एक फसल पर मिलता है, तो किसान जोखिम क्यों उठाएगा?
आज भारत की खेती एक अजीब विरोधाभास से गुजर रही है. सरकारें एक तरफ दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भर बनने का नारा देती हैं, लेकिन जब आर्थिक मदद या बोनस की बात आती है, तो सारा ध्यान धान और गेहूं पर ही सिमट जाता है. तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में धान पर मिलने वाले भारी बोनस और सुनिश्चित खरीद ने किसानों को दूसरी फसलों से दूर कर दिया है. यहां तक कि 'सोया स्टेट' कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में भी किसान अब सोयाबीन छोड़कर धान की तरफ भाग रहे हैं. पंजाब में धान की शत-प्रतिशत सरकारी खरीद ने इसे एक सुरक्षित विकल्प बना दिया है, जबकि दालों की सरकारी खरीद आज भी अनिश्चित है. नतीजा यह है कि आज भी हम अपनी जरूरत का 60% खाद्य तेल विदेशों से मंगा रहे हैं, जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है.
'धान प्रेम' इसी तरह चलता रहा, तो आने वाले समय में हमारी मिट्टी और पानी दोनों खत्म हो जाएंगे. धान उगाने में लगने वाले बेतहाशा पानी के कारण पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों का भूजल स्तर खतरनाक हद तक नीचे गिर गया है. अब समय आ गया है कि सरकारें 'फसल-विशिष्ट' बोनस सिर्फ धान पर पैसा देने के बजाय 'फसल-तटस्थ' नीति अपनाएं. हरियाणा की 'मेरा पानी-मेरी विरासत' योजना इसका बेहतरीन उदाहरण है, जहां धान छोड़कर दूसरी फसलें उगाने पर आर्थिक मदद दी जाती है. हमें किसानों को यह भरोसा दिलाना होगा कि यदि वे दालें या तिलहन उगाते हैं, तो उन्हें धान से कम मुनाफा नहीं होगा. अगर राजनीति ने विज्ञान और पर्यावरण की इस चेतावनी को अनसुना किया, तो भविष्य में गोदामों में अनाज तो भरा होगा, लेकिन न उसे पकाने के लिए तेल होगा और न शरीर को पोषण देने के लिए दालें?
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