Farming issue: खाद-पानी की किल्लत, थाली पर आफत, खाड़ी संकट और अल नीनो की दोहरी मार का डर

Farming issue: खाद-पानी की किल्लत, थाली पर आफत, खाड़ी संकट और अल नीनो की दोहरी मार का डर

खाड़ी देशों में जारी तनाव और समुद्री रास्तों में रुकावट की वजह से इस साल खरीफ सीजन में खाद की भारी किल्लत का खतरा मंडरा रहा है. खेती में सही समय पर खाद डालना सबसे जरूरी होता है, और जून-जुलाई में धान की रोपाई के वक्त इसकी सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है. अगर शुरुआती हफ्तों में खाद न मिली, तो बाद में सप्लाई का कोई फायदा नहीं होगा. मुसीबत यह है कि एक तरफ 'अल नीनो' की वजह से सूखे या खराब मौसम का डर है, तो दूसरी तरफ खाड़ी संकट के कारण खाद की सप्लाई सालों तक प्रभावित रह सकती है. ऐसे में किसानों के पास कम खाद डालने या दूसरी फसल चुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा, जिससे पैदावार घटेगी और आने वाले दिनों में आम आदमी की थाली महंगी होना तय है.

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खाद-पानी की किल्लत, थाली पर आफत, खाड़ी संकट और अल नीनो की दोहरी मार का डरकिसानों पर अल नीनो और खाद संकट की मार पड़ सकती है (AI जनरेटेड इमेज)

सरकार ने भरोसा दिलाया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव और शिपिंग की रुकावटों के बावजूद खरीफ 2026 के लिए देश में खाद की कोई किल्लत नहीं होगी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस समय देश में कुल 390.54 लाख मीट्रिक टन खाद का स्टॉक मौजूद है. अगर सिर्फ यूरिया की बात करें, तो 56.66 लाख टन घरेलू उत्पादन और 13.60 लाख टन आयात को मिलाकर कुल 70.26 लाख टन यूरिया फिलहाल हाथ में है. लेकिन असली पेच समय की पाबंदी का है.

पिछले साल जून से अक्टूबर के बीच किसानों ने करीब 180.75 लाख मीट्रिक टन यूरिया खरीदा था, जिसमें से अकेले जून, जुलाई और अगस्त के शुरुआती तीन महीनों में ही 132.37 लाख मीट्रिक टन की भारी खपत हो चुकी थी—यानी पूरे खरीफ सीजन की कुल यूरिया जरूरत का लगभग 73% हिस्सा सिर्फ इन तीन महीनों में ही लग जाता है. इसमें भी सबसे ज्यादा मारामारी जून और जुलाई के शुरुआती दौर में होती है, जब धान की रोपाई के वक्त कुल यूरिया का करीब 50% अकेले इन दो महीनों में ही खेतों में डालना पड़ता है. साफ है कि इस बार खरीफ सीजन को सही-सलामत पार लगाने के लिए सरकार को फौरन कम से कम 110 लाख टन अतिरिक्त यूरिया का बंदोबस्त करना होगा, क्योंकि अगर शुरुआती दो-तीन महीनों में खाद वक्त पर नहीं पहुंची, तो बाद में सप्लाई सामान्य होने का भी कोई फायदा नहीं मिलेगा.

खाड़ी संकट ने बढ़ाई किसानों की टेंशन

खेती-किसानी में वक्त की पाबंदी सबसे बड़ा खेल है. फसलों को बोते समय ही नाइट्रोजन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. पौधों को एक तय समय पर ही यूरिया की जरूरत होती है. एक बार जब बीज मिट्टी में चले गए और पौधे बड़े होने लगे, तो वो सही समय निकलने के बाद खाद डालने का कोई फायदा नहीं होता. खेती का सीजन किसी देश के सियासी संकट या जंग के खत्म होने का इंतजार नहीं करता. आज दुनिया का लगभग 36% यूरिया खाड़ी देशों से आता है, क्योंकि वहां यूरिया बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल यानी नेचुरल गैस बहुत सस्ती मिलती है. मगर ईरान में जारी तनाव की वजह से इन फैक्ट्रियों में काम सुस्त पड़ गया है और होर्मुज जलडमरूमध्य का समुद्री रास्ता बंद होने की कगार पर है.

सबसे बड़ी किल्लत यह है कि सरकारें पेट्रोलियम की तरह खाद का बहुत बड़ा 'इमरजेंसी स्टॉक' बनाकर नहीं रख सकतीं, क्योंकि यह केमिकल वक्त के साथ खराब होने लगता है और इससे जहरीली गैसों के रिसाव का खतरा बढ़ जाता है.

अल नीनो और खराब मौसम का डर

जब एक तरफ खाद की किल्लत हो और दूसरी तरफ मौसम भी दगा दे जाए, तो आफत आनी तय है. इस साल मौसम पर 'अल नीनो'  का साया मंडरा रहा है. अल नीनो समंदर में होने वाली एक ऐसी हलचल है जो पूरी दुनिया के मौसम का मिजाज बिगाड़ देती है, जिससे कहीं भयानक सूखा पड़ता है तो कहीं अचानक सैलाब आ जाता है. अगर प्रशांत महासागर का तापमान 2 डिग्री से ज्यादा बढ़ा, तो यह 'सुपर अल नीनो' का रूप ले लेगा, जो खड़ी फसलों को तबाह कर सकता है.

इतिहास गवाह है कि साल 2022 में जब रूस-यूक्रेन जंग शुरू हुई थी, तब पोटाश और फॉस्फोरस की भारी कमी हो गई थी. उसके तुरंत बाद 2023 में अल नीनो ने दस्तक दी, जिससे चावल की पैदावार इतनी घटी कि भारत को इसके एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगानी पड़ी थी.

फसलों के लिए क्यों जरूरी है नाइट्रोजन खाद?

पूरी दुनिया में जितनी भी खाद का इस्तेमाल होता है, उसका आधा से ज्यादा हिस्सा सिर्फ यूरिया का होता है. तीन मुख्य फसलों—मक्का 20%, गेहूं (18%) और धान (16%) में जाता है. भारत की बात करें तो यहां के किसान खरीफ में धान में यूरिया पर 37 फीसदी और गेहूं पर 24 फीसदी खाद खर्च करते हैं. यूरिया, जो कि नाइट्रोजन का सबसे बड़ा जरिया है, उसे बुआई के वक्त ही मिट्टी में मिलाना जरूरी होता है और बढ़वार के समय भी जरूरत होती है.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि खाड़ी देशों में पैदा हुए इस संकट के चलते खाद की सप्लाई को पूरी तरह पटरी पर लौटने में 1 से 4 साल का वक्त लग सकता है. अगर हालात नहीं सुधरे, तो सितंबर-अक्टूबर से शुरू होने वाली सर्दियों की फसल गेहूं के लिए किसानों को परेशानी उठाना पड़ सकता है.

किसानों के पास बचे तीन रास्ते 

इस संकट की घड़ी में दुनिया भर के किसानों के सामने सिर्फ तीन ही रास्ते बचते हैं, जहां पहले विकल्प के तहत किसान महंगी खाद खरीदकर भी पूरी फसल उगाएंगे, जिससे खेती की लागत बढ़ने के कारण बाजार में अनाज बहुत महंगा बिकेगा. वहीं दूसरे विकल्प के अनुसार अगर वे खाद का इस्तेमाल कम कर देते हैं, तो फसल कमजोर होने से बाजार में अनाज की भारी किल्लत हो जाएगी. और तीसरे विकल्प के तहत अगर किसान इस मुख्य फसल को छोड़कर कम खाद वाली कोई दूसरी फसल बोने का फैसला करते हैं, तो बाजार से चावल और गेहूं जैसे मुख्य अनाज कमी होगी. यानी घूम-फिरकर इन तीनों ही सूरतों का सीधा और तीखा असर आम जनता की जेब पर ही पड़ना तय है.

बढ़ेगी लागत, महंगी होगी थाली

लब्बोलुआब यह है कि आज का यह संकट सिर्फ गैस या डीजल की किल्लत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले दिनों में हमारी रसोई और मुल्क की खाद्य सुरक्षा पर बहुत बड़ा हमला है. भले ही ईरान का विवाद आज थम जाए, लेकिन इसके साइड-इफेक्ट्स अगले कई महीनों या सालों तक दिखाई देंगे.

जून के महीने में मौसम विभाग (IMD) अल नीनो को लेकर जो नई रिपोर्ट जारी करेगा, उस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं. दूसरी तरफ, सिंचाई के लिए जो किसान पूरी तरह डीजल पंपों पर निर्भर हैं, डीजल की बढ़ती कीमतों ने उनकी कमर पहले ही तोड़ रखी है. अगर सही समय पर किसानों को यूरिया नहीं मिला और ऊपर से सूखे की मार पड़ गई, तो फैक्ट्रियों और सरहदों से शुरू हुआ यह संकट सीधे आम आदमी की थाली को सूना और महंगा कर देगा.

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