Kashmir Weather: कम बर्फबारी से पानी की इमरजेंसी, खेती का संकट, कश्‍मीर में मौसम को यह क्‍या हो गया?

Kashmir Weather: कम बर्फबारी से पानी की इमरजेंसी, खेती का संकट, कश्‍मीर में मौसम को यह क्‍या हो गया?

जम्मू और कश्मीर में सर्दियों में बारिश में कमी सूखे का मुख्य कारण है. दिसंबर और जनवरी में फरवरी, मार्च और अप्रैल के मुकाबले कम वेस्टर्न डिस्टर्बेंस आते हैं. इसके अलावा, एल नीनो कंडीशन और नॉर्थ अटलांटिक ऑसिलेशन जैसे ग्लोबल विंड सर्कुलेशन में बदलाव की वजह से कमजोर और कम नमी वाले डिस्टर्बेंस आ रहे हैं. बढ़ते तापमान से बारिश का तरीका बदल रहा है, खासकर कम और बीच की ऊंचाई पर बर्फबारी की जगह ज्‍यादा बारिश हो रही है. 

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Kashmir Weather: कम बर्फबारी से पानी की इमरजेंसी, खेती का संकट, कश्‍मीर में मौसम को यह क्‍या हो गया?

जम्‍मू कश्‍मीर के किसानों के लिए बुरे दिन खत्‍म होने का नाम नहीं ले रहे हैं. मौसम विभाग का कहना है कि फिलहाल बारिश की कोई उम्‍मीद नहीं है. विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि अभी सूखे के हालात जारी रहने की आशंका है. घाटी के किसान अभी तक बर्फबारी का इंतजार कर रहे हैं. मौसम विज्ञानियों का कहना है कि कश्मीर में कम बर्फबारी से मौसम की वजह से सूखा पड़ने की 100 फीसदी आशंकाएं हैं. कम बारिश की वजह से हाइड्रोपावर और खेती का सूखा पड़ने की पूरी आशंकाएं हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस सर्दी में कश्मीर में कम बर्फबारी सिर्फ मौसमी गड़बड़ी नहीं है बल्कि मौसम की वजह से सूखे का शुरुआती संकेत है. 

कमजोर वेस्‍टर्न डिस्‍टर्बेंस 

मौसम विभाग श्रीनगर सेंटर के डायरेक्टर ने मुख्तार अहमद ग्रेटर कश्मीर को बताया जम्मू और कश्मीर में सर्दियों में बारिश में कमी सूखे का मुख्य कारण है. उन्होंने कहा, 'क्लाइमेट के हिसाब से, दिसंबर और जनवरी में फरवरी, मार्च और अप्रैल के मुकाबले कम वेस्टर्न डिस्टर्बेंस आते हैं. इसके अलावा, एल नीनो कंडीशन और नॉर्थ अटलांटिक ऑसिलेशन जैसे ग्लोबल विंड सर्कुलेशन में बदलाव की वजह से कमजोर और कम नमी वाले डिस्टर्बेंस आ रहे हैं.' मौसम विभाग (IMD) ने भी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के ट्रैक बदलने की ओर इशारा किया है. इसके मुताबिक, बढ़ते तापमान से बारिश का तरीका बदल रहा है, खासकर कम और बीच की ऊंचाई पर बर्फबारी की जगह ज्‍यादा बारिश हो रही है. 

कम हो गई बर्फबारी 

लंबे समय के असर के बारे में बताते हुए, कश्मीर यूनिवर्सिटी (KU) के ज्योग्राफी और डिजास्टर मैनेजमेंट डिपार्टमेंट के प्रोफेसर मुहम्मद सुल्तान भट ने कहा कि देश के ज्‍यादातर हिस्सों के उलट, कश्मीर के वेदर सिस्टम पर मॉनसून के बजाय वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का दबदबा है. इससे यह वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के व्यवहार में बदलाव के लिए खासतौर पर कमजोर हो जाता है. प्रोफेसर भट ने कहा, 'पिछले 10 से 15 सालों में, वेस्टर्न डिस्टर्बेंस में बहुत बड़ा बदलाव आया है.' बर्फबारी की मात्रा में काफी कमी आई है जबकि बारिश का ज्‍यादातर हिस्सा अब बर्फ के बजाय बारिश के रूप में हो रहा है.' उन्होंने कहा कि क्लाइमेट चेंज ने मेडिटेरेनियन सोर्स इलाकों पर असर डाला है, जहां से वेस्टर्न डिस्टर्बेंस नमी लेते हैं. 

बारिश का लेवल जाएगा सामान्‍य 

गर्मी के कारण, इन सिस्टम की नमी ले जाने की क्षमता कम हो गई है. कमजोर डिस्टर्बेंस सेंट्रल एशियाई इलाकों और पहाड़ी रुकावटों में ठीक से पहुंच नहीं पा रहा है. इससे कश्मीर में इसकी तेज़ी कम हो गई है. उन्होंने बर्फबारी के समय में भी बदलाव देखा, पहले नवंबर और जनवरी के बीच होने वाली भारी बर्फबारी अब जनवरी के आखिर, फरवरी और मार्च तक भी हो रही है.  प्रोफेसर ने चेतावनी दी कि कश्मीर अभी मौसम से जुड़े सूखे का सामना कर रहा है. इसका मतलब है कि लगातार बारिश का लेवल नॉर्मल से नीचे चला जाएगा. 

फसलों पर होगा बुरा असर 

अगर यही स्थिति जारी रहती है तो इससे हाइड्रोलॉजिकल सूखा पड़ेगा जिसमें नदियों, झरनों, झीलों, झरनों और जलाशयों में पानी का लेवल कम हो जाएगा. लंबे समय तक हाइड्रोलॉजिकल तनाव से आखिरकार खेती में सूखा पड़ेगा जिससे धान और बागवानी जैसे पानी पर निर्भर फसलों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. लंबे समय में, यह सिलसिला सामाजिक-आर्थिक सूखे का कारण बन सकता है जिससे रोजी-रोटी, इनकम और डेयरी, बागवानी और हाइड्रोपावर जैसे जुड़े हुए सेक्टर पर असर पड़ेगा.उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान, ईरान और लद्दाख सहित दूसरे वेस्टर्न डिस्टर्बेंस वाले इलाकों में भी बारिश में इसी तरह की गिरावट देखी जा रही है. 

सभी सेक्टर में बढ़ती चिंताएं

अभी तक चल रहे सूखे ने किसानों, बागवानों और पावर सेक्टर के अधिकारियों के बीच चिंता पैदा कर दी है.सर्दियों में बर्फबारी ग्राउंडवॉटर रिचार्ज और गर्मियों में नदियों के बहाव को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है. हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों ने कहा कि सर्दियों के मौसम का पैटर्न बदलता रहता है.फरवरी में आमतौर पर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की एक्टिविटी ज्‍यादा होती है हालांकि बड़े पैमाने पर ट्रेंड बढ़ते क्लाइमेट अनसर्टेनिटी की ओर इशारा करता है. 


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