El Nino का असर शुरू: कमजोर मॉनसून का खतरा बढ़ा, खेती और महंगाई पर मंडरा रहा संकट

El Nino का असर शुरू: कमजोर मॉनसून का खतरा बढ़ा, खेती और महंगाई पर मंडरा रहा संकट

भारत में अल नीनो का असर दिखने लगा है, जिससे मॉनसून कमजोर पड़ सकता है. IMD और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमान के बीच बारिश कम रहने की आशंका बढ़ गई है, जिससे खेती, फसल उत्पादन और महंगाई पर असर पड़ सकता है.

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El Nino का असर शुरू: कमजोर मॉनसून का खतरा बढ़ा, खेती और महंगाई पर मंडरा रहा संकटभारत में अल नीनो का खतरा बढ़ा (AI जनरेटेड फोटो)

अल नीनो भारत के मौसम विशेषज्ञों की उम्मीद से ज्यादा तेजी से बना है, और मॉनसून पर इसका असर अभी से दिखने लगा है. जब 'इंडिया टुडे' ने मई में सबसे पहले इस अल नीनो के बारे में रिपोर्ट दी थी, तब कहानी के दोनों हिस्से सिर्फ अनुमान थे. प्रशांत महासागर गर्म हो रहा था, और भारत मौसम विज्ञान विभाग ने सामान्य से कम बारिश वाले मॉनसून की चेतावनी दी थी. जून के मध्य तक, ये दोनों बातें हकीकत बन चुकी हैं.

11 जून को, अमेरिका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने घोषणा की कि अल नीनो बन गया है और एक एडवाइजरी जारी की, जिसमें सर्दियों तक इसके बहुत मजबूत होने की 63 प्रतिशत संभावना जताई गई है. भारत का अपना मौसम विभाग ज्यादा सावधानी बरत रहा है. वह अभी भी प्रशांत महासागर की स्थिति को 'न्यूट्रल' (तटस्थ) बता रहा है, लेकिन साथ ही यह भी कह रहा है कि यह "अल नीनो की ओर बढ़ रहा है". यह फर्क थ्रेशोल्ड (सीमा) को लेकर है, दिशा को लेकर नहीं.

और यह ऐसे महासागर में बन रहा है जो पहले से ही अपने सबसे गर्म स्तर के करीब है. यूरोपीय संघ की कोपरनिकस क्लाइमेट सर्विस और NOAA के अनुसार, मई 2026 दुनिया के महासागरों के लिए रिकॉर्ड पर सबसे गर्म मई के मामले में 2024 के बराबर रहा. यह नया गर्म दौर उस गर्मी पर बन रहा है जो कभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई थी.

मॉनसून नाजुक मोड़ पर

29 मई को, IMD ने अपने मौसमी अनुमान को घटाकर लंबे समय के औसत का 90 प्रतिशत (सामान्य से कम) कर दिया, जो 13 अप्रैल को 92 प्रतिशत रहने का अनुमान था. इसने कम बारिश वाले मौसम की संभावना को 35 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया. इसने सामान्य से कम या उससे भी खराब मॉनसून की संभावना को 84 प्रतिशत बताया. मॉनसून का मुख्य क्षेत्र, जिसमें भारत की ज्यादातर बारिश पर निर्भर खेती वाली जमीन आती है, वहां बारिश के सामान्य से कम रहने की सबसे ज्यादा संभावना है.

मौसम की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक हुई. मॉनसून 4 जून को केरल पहुंचा - तीन दिन की देरी से, लेकिन सामान्य समय-सीमा के भीतर और फिर उम्मीद से कमजोर रहा. IMD के लंबे समय के अनुमान के अनुसार, 1 से 10 जून के बीच पूरे भारत में बारिश सामान्य से 26 प्रतिशत कम रही और 15 जून तक भी कम ही बनी रही.

बारिश की कमी हर जगह एक जैसी नहीं है. IMD के ग्रिड वाले डेटा से पता चलता है कि पहले पखवाड़े में सबसे ज्यादा कमी मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी भारत में देखी गई, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बारिश सामान्य के करीब या सामान्य से ज्यादा रही.

मॉनसून को सहारा देने वाले आम कारकों में से एक भी कमजोर पड़ गया है. अप्रैल में, IMD को 'पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल' (हिंद महासागर में तापमान का अंतर) की उम्मीद थी. पूर्वी अफ्रीका के पास समुद्र का एक गर्म हिस्सा जो अक्सर भारत की ओर ज्यादा नमी खींचता है. 11 जून के अनुमान में इसे घटाकर 'न्यूट्रल' (सामान्य स्थिति) कर दिया गया है, और अब मौसम के आखिर में ही इसके थोड़ा 'पॉजिटिव' होने की संभावना है. जो सहारा पिछले अल-नीनो मॉनसून के दौरान काम आया था, वह इस बार कमजोर और देर से आता दिख रहा है.

अल नीनो का दिखने लगा असर

इन आंकड़ों ने केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है. मंत्रालय ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों व विभागों से कहा है कि वे खरीफ सीजन के चरम पर पहुंचने से पहले अल-नीनो वाले साल के लिए अपनी आपातकालीन योजनाओं (contingency plans) की समीक्षा करें. 'डाउन टू अर्थ' के अनुसार, संशोधित योजनाएं 20 जून तक जमा की जानी हैं. 

IMD का अनुमान सिर्फ एक जानकारी है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर जिले में सिंचाई की सुविधा, मिट्टी का प्रकार, फसल उगाने का तरीका और भूजल की उपलब्धता पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कमजोर मॉनसून की वजह से सूखे और खेती पर संकट का सबसे ज्यादा असर कहां पड़ेगा.

आगे क्या होगा

'इंडिया टुडे' ने मई में अपनी पहली रिपोर्ट में बताया था कि सामान्य से कम मॉनसून का देश के खेतों, खाने-पीने की चीजों की कीमतों और ग्रामीण आय पर क्या असर पड़ेगा. दो महीने बाद, अनुमान हकीकत में बदल गए हैं- अल नीनो बन चुका है, अनुमान घटा दिए गए हैं और बारिश कम हो गई है. ज्यादा मुश्किल सवाल यह है कि इस सर्दियों में प्रशांत महासागर में अल नीनो के चरम पर पहुंचने से पहले भारत क्या फसल उगाएगा, क्या अनाजों का स्टॉक करेगा और कीमतें क्या होंगी.(दीपू राय की रिपोर्ट)

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