तपेगी धरती, घटेगा उत्पादन...क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा श‍िकार बनेगा चावल, ये रही चौंकाने वाली र‍िपोर्ट

तपेगी धरती, घटेगा उत्पादन...क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा श‍िकार बनेगा चावल, ये रही चौंकाने वाली र‍िपोर्ट

भारत में चावल उत्पादन पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जहां 2050 और 2080 तक भारी गिरावट के संकेत मिले हैं. सरकारी अध्ययन में जलवायु परिवर्तन को इसकी मुख्य वजह बताया गया है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है.

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तपेगी धरती, घटेगा उत्पादन...क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा श‍िकार बनेगा चावल, ये रही चौंकाने वाली र‍िपोर्टधान उत्‍पादन पर बड़ा खतरा

भारत में सबसे ज्यादा खाए जाने वाले अनाज, चावल पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है. एक हालिया डरावनी रिपोर्ट के अनुसार, जो चावल देश की कुल खाद्य फसलों के उत्पादन में लगभग 42% की विशाल हिस्सेदारी रखता है, उसकी पैदावार में वर्ष 2050 तक करीब 20 प्रतिशत की भारी गिरावट आ सकती है. चिंता की बात यह है कि यह संकट यहीं नहीं थमेगा, साल 2080 तक यह उत्पादन लगभग 47 प्रतिशत तक घटने का अनुमान है. भारत की खाद्य सुरक्षा की नींव को हिला देने वाला यह खतरनाक बदलाव पूरी तरह से जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और तेजी से बढ़ते वैश्विक तापमान का परिणाम होगा. अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो भारत जैसे सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश के ल‍िए यह बड़ा संकट होगा.

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research- ICAR) के सरकारी प्रोजेक्ट ‘नेशनल इनोवेशन्स इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर’ यानी NICRA की स्‍टडी में धान और अन्‍य फसलों के उत्‍पादन में गिरावट की आशंका जताई गई है. केंद्र सरकार ने पिछले साल फरवरी में ससंद में इस स्‍टडी को पेश किया था. इस स्‍टडी में साफ कहा गया है कि अगर समय रहते अनुकूलन उपाय नहीं किए गए तो धान यानी चावल, गेहूं और मक्‍का के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है.

उत्‍पादन में गिरावट के डराने वाले आंकड़े

रिपोर्ट के मुताबिक, बारिश आधारित यानी रेनफेड धान की पैदावार में वर्ष 2050 तक करीब 20 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, जो 2080 तक बढ़कर लगभग 47 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं, सिंचित धान यानी इरिगेटेड राइस के उत्‍पादन में भी गिरावट का खतरा बना हुआ है, जिसमें 2050 तक करीब 3.5 प्रतिशत और 2080 तक लगभग 5 प्रतिशत तक उत्पादन घट सकता है. यह संकेत देता है कि धान उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन का असर लंबे समय में और गहरा होगा.

स्‍टडी के मुताबिक, धान के अलावा गेहूं और मक्‍का के उत्‍पादन में भी गिरावट का अनुमान है. NICRA के आकलन के अनुसार, गेहूं का उत्‍पादन वर्ष 2050 तक करीब 19.3 प्रतिशत और 2080 तक लगभग 40 प्रतिशत तक घट सकता है. वहीं, खरीफ मक्का के उत्पादन में 2050 तक करीब 18 प्रतिशत और 2080 तक लगभग 23 प्रतिशत गिरावट का अनुमान है. जिससे आने वाले समय में अनाज उत्पादन और खाद्य सुरक्षा दोनों पर दबाव बढ़ सकता है. 

खेती के लिहाज से हाई रिस्क में कई इलाके

सरकार ने इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्‍लाइमेट चेंज (Intergovernmental Panel on Climate Change- IPCC) के प्रोटोकॉल के आधार पर देश के 651 कृषि प्रधान जिलों में क्लाइमेट रिस्क और वल्नरेबिलिटी का आकलन किया था. इसमें 109 जिलों को ‘बहुत अधिक संवेदनशील’ और 201 जिलों को ‘उच्च संवेदनशील’ श्रेणी में रखा गया है. इसका मतलब है कि इन इलाकों में खेती, खासकर धान जैसी फसलों पर जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से दिख सकता है. 

बदलते मौसम पैटर्न से धान की खेती पर असर

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि तापमान में बढ़ोतरी और बारिश के पैटर्न में बदलाव धान उत्पादन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहे हैं. कुछ क्षेत्रों में प्री-मानसून बारिश बढ़ रही है, जबकि खरीफ सीजन की शुरुआत में बारिश घट रही है. इससे धान की बुवाई और शुरुआती विकास प्रभावित होता है, जिससे कुल उत्पादन पर असर पड़ता है. हालांकि, सरकार ने उत्‍पादन में गिरावट से बचाव के लिए समाधान और उपायों की जानकारी भी दी. लेकिन ये जमीनी स्‍तर पर कितने सफल साबित होंगे, यह समय के साथ ही पता चलेगा.  

समाधान के लिए क्या कर रही है सरकार?

सरकार ने नेशनल मिशन फॉर सस्‍टेनेबल एग्रीकल्‍चर के तहत कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनका मकसद खेती को जलवायु के हिसाब से लचीला (क्लाइमेट-रेजिलिएंट) बनाना है. इसके लिए माइक्रो इरिगेशन, क्लाइमेट रेजिलिएंट वैरायटी और डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसके अलावा 651 जिलों के लिए डिस्ट्रिक्ट एग्रीकल्चर कंटीजेंसी प्लान भी तैयार किए गए हैं, ताकि मौसम के उतार-चढ़ाव से निपटा जा सके.

देश में क्‍लाइमेट रेजिलिएंट गांव (Climate Resilient Villages) की पहल के तहत देश के संवेदनशील जिलों में 448 गांवों में नई तकनीकों का प्रदर्शन किया गया है. इसमें सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन, एरोबिक राइस और जीरो टिलेज जैसी तकनीकें शामिल हैं, जो कम पानी और बदलते मौसम में भी बेहतर उत्पादन देने में मदद करती हैं.

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