बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों को मिला GI टैग, नालंदा की बावन बूटी से भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग तक बढ़ी पहचान

बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों को मिला GI टैग, नालंदा की बावन बूटी से भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग तक बढ़ी पहचान

बिहार की सांस्कृतिक और हस्तशिल्प विरासत को नई मजबूती मिली है. राज्य के तीन पारंपरिक उत्पादों को GI टैग मिलने के बाद इनकी पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने की संभावना है. इससे स्थानीय कला, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिल सकता है.

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बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों को मिला GI टैग, नालंदा की बावन बूटी से भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग तक बढ़ी पहचानबिहार के 3 उत्पादों को मिला GI Tag

बिहार की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प और ग्रामीण उत्पादों को नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है. राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) और बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों से राज्य के तीन पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग प्रदान किया गया है. इस सूची में नालंदा की बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, गया का पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग शामिल हैं. इस उपलब्धि को राज्य के शिल्पकारों, बुनकरों और ग्रामीण उत्पादक समुदाय के लिए बड़े सम्मान के रूप में देखा जा रहा है.

GI टैग क्या है और इससे क्या मिलेगा फायदा

GI टैग किसी उत्पाद की विशिष्टता, गुणवत्ता और उसके भौगोलिक मूल को कानूनी पहचान और संरक्षण प्रदान करता है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी क्षेत्र विशेष की पारंपरिक कला या उत्पाद की मौलिक पहचान बनी रहे और उसका उपयोग निर्धारित मानकों के अनुसार ही किया जाए. देश में GI टैग जारी करने की प्रक्रिया भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, चेन्नई के माध्यम से संचालित की जाती है.

नालंदा की बावन बूटी को मिली नई पहचान

नालंदा जिले की प्रसिद्ध बावन बूटी बिहार की प्राचीन बुनकरी परंपरा की एक विशिष्ट कला मानी जाती है. इस वस्त्रकला की खासियत यह है कि हाथकरघे पर कपड़े में 52 प्रकार के पारंपरिक बौद्ध और सांस्कृतिक प्रतीकों को बुना जाता है. यह परंपरा मुख्य रूप से बसवन बिगहा और आसपास के क्षेत्रों में विकसित हुई, जहां कई पीढ़ियों से बुनकर परिवार इस कला को संरक्षित और आगे बढ़ाते आ रहे हैं. GI टैग मिलने से इस पारंपरिक शिल्प को बाजार और पहचान दोनों स्तरों पर मजबूती मिलने की उम्मीद है.

पत्थरकट्टी शिल्प सदियों से बनाए हुए है अपनी पहचान

गया जिले के पत्थरकट्टी गांव की पत्थर शिल्पकला लगभग 300 वर्षों से अपनी अलग पहचान रखती है. यहां के कारीगर स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग कर भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, देवी-देवताओं और अन्य कलात्मक प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं. इस क्षेत्र को लेकर यह भी माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर के निर्माण में यहां के ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग किया गया था. GI टैग से इस पारंपरिक शिल्प को व्यापक पहचान मिलने की संभावना बढ़ी है.

पिढ़िया पेंटिंग में दिखती है लोक जीवन की झलक

भोजपुर क्षेत्र की पिढ़िया पेंटिंग बिहार की लोक चित्रकला की एक विशेष शैली है, जिसे मुख्य रूप से महिलाएं पारंपरिक पर्व-त्योहारों और सामाजिक अवसरों पर बनाती रही हैं. इस कला में प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक आस्था और स्थानीय संस्कृति को चित्रों में उकेरा जाता है. यह लोक कला क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी मानी जाती है.

पंजीकरण प्रक्रिया में इन्‍होंने निभाई भूमिका

इन तीनों उत्पादों को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया केवल औपचारिक पंजीकरण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके लिए व्यापक स्तर पर दस्तावेज तैयार किए गए और स्थानीय समुदायों को जोड़ा गया. इस प्रक्रिया में Human Welfare Association (HWA), वाराणसी के महासचिव पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने महत्वपूर्ण मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग दिया. वहीं, नाबार्ड ने उत्पादक समूहों, शिल्पकार संगठनों और स्थानीय समुदायों के साथ समन्वय बनाते हुए आवेदन, दस्तावेजीकरण और GI पंजीकरण की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई.

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