फिर शुरू होगी मढ़ौरा चीनी मिलबिहार की मढ़ौरा चीनी मिल कई साल से बंद पड़ी है. प्रदेश की यह सबसे पुरानी मिल (1904 में स्थापित) थी जो सरकारी अनदेखी का दंश झेलते-झेलते 1998 में बंद हो गई. तब से यह मिल न तो धुआं उगलती है न सायरन के आवाज. इस मिल की चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि लोहा-लक्कड़ से बनी यह मिल केवल कारखाना नहीं, बल्कि कई भावुक पलों को समेटे हुए है. यह मिल इतनी रसूखदार थी कि रेलवे जैसी मलाईदार नौकरी छोड़ कर कई लोग इसके कर्मचारी बने. वर्षों तक सब कुछ ठीक चला, लेकिन बाद में हालात बिगड़ते गए.
1998 में मिल बंद हो गई. शटर गिरने के साथ ही कर्मचारियों की सभी खुशियां धराशायी हो गईं. उनके पास रेलवे की नौकरी बची, न मिल की तनख्वाह. न इधर के रहे, न उधर के. तकदीर को भी नहीं कोस सकते थे क्योंकि रेलवे छोड़ने और मिल जॉइन करने का फैसला अपना था. किसी ने जबरन थोपा नहीं था. कई साल गुजर गए, कर्मचारी इस आस में हैं कि चीनी मिल खुले तो बकाया मिले. इन कर्मचारियों की आंखों में मायूसी के साथ कुछ उम्मीदें भी हैं कि मिल खुलते ही पुरानी खुशियां फिर बहाल होंगी.
मढ़ौरा चीनी मिल 1904 में शुरू हुई जब देश में अंग्रेजी हुकूमत थी. स्थानीय लोग बताते हैं कि अंग्रेजों की सूझ-बूझ का नतीजा था जो सबसे पहली मिल मढ़ौरा की माटी में शुरू की गई क्योंकि सबसे अच्छा गन्ना भी यही होता था. मिल शुरू होते ही कुछ ही साल में आर्थिक तरक्की का केंद्र बन गई. लोगों ने अच्छी नौकरियां छोड़कर इसमें दाखिला लिया.
समय का पहिया बढ़ता गया, लेकिन तकनीक वही पुरानी रही. मिल का प्रबंधन भी अपने पुराने ढर्रे पर काम करता रहा. इस कुप्रबंधन और बढ़ते खर्च ने मिल का शटर गिरा दिया. आज यह कारखाना पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चुका है जिसके अधिकांश कल-पुर्जे चोरी हो गए हैं.
मिल के एक पुराने कर्मचारी ने बताया, एक दौर था जब बिहार के सारण जिले का मढ़ौरा 'चीनी का कटोरा' कहलाता था. यहां की चीनी मिल की धमक ऐसी थी कि लोग भारतीय रेलवे की सरकारी नौकरी छोड़ कर यहां काम करने आते थे. लेकिन 1998 में मिल का सायरन क्या खामोश हुआ, हजारों परिवारों की जिंदगी से मिठास ही गायब हो गई.
बुजुर्ग कर्मचारियों से बात करें तो 28 साल का लंबा इंतजार, पलायन का दर्द और खेतों में दम तोड़ती गन्ने की फसल का पूरा ब्योरा मिल जाएगा. बिहार सरकार ने दोबारा मिल खोलने का फैसला किया है, लेकिन इस फैसले को 28 साल हो गए. इस इंतजार ने कई कर्मचारी और किसानों को पलायन में धकेल दिया. बुजुर्ग कर्मचारी गन्ने की दम तोड़ती खेती का भी जिक्र करते हैं. वे बताते हैं कि जब मिल नहीं तो गन्ने का क्या मतलब. मिल गई, और साथ में ले गई गन्ने की खेती. अब न गन्ने की मिठास है, न सायरन की आवाज.
लोगों से बातचीत में पता चला कि छपरा से सटे मढ़ौरा ने सिर्फ एक मिल नहीं खोई, बल्कि अपनी रोजी-रोटी की पहचान खो दी. जो हाथ कभी गन्ने छीलते थे, वो दिल्ली-मुंबई की सड़कों पर मजदूरी करने को मजबूर हो गए. पहले अपनी धरती पर रोजगार का गर्व था, तो अब परदेस में मजदूरी का दर्द है. लेकिन अब, हवाओं का रुख बदल रहा है. बंद पड़ी चीनी मिलों में फिर से सुगबुगाहट है.
बिहार सरकार के उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा और अन्य अधिकारियों ने इस मिल को एक साल के भीतर फिर से चालू करने का आश्वासन दिया है, जो इस क्षेत्र में नए औद्योगिक विकास (25 नई चीनी मिलों की योजना) का हिस्सा है. अगर यह मिल फिर से चालू होती है, तो यह स्थानीय गन्ना किसानों को राहत देगी और क्षेत्र में पलायन कम करने में मदद करेगी.
मिल दोबारा शुरू होने की खबरों ने पुराने कर्मचारियों की धुंधली आंखों में एक नई चमक भर दी है. कर्मचारियों को भरोसा है कि मढ़ौरा मिल फिर से धुआं उगलेगी, यहां गन्ने की मिठास फिर घुलेगी.
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