सोयाबीन की खेती से शुरू हुआ सफरराजस्थान के बूंदी जिले के छोटे से गांव खटकर की सावित्री गौर की कहानी बताती है कि अगर किसान को सही जानकारी, ट्रेनिंग और साथ मिले तो खेती के साथ पूरी जिंदगी बदली जा सकती है. कभी गांव की दूसरी महिलाओं की तरह घूंघट में रहने वाली सावित्री आज हजारों महिला किसानों को खेती का ज्ञान बांट रही हैं. वह समृद्धि महिला क्रॉप प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड की चेयरपर्सन हैं. इस किसान उत्पादक कंपनी से 2310 महिला किसान जुड़ी हैं.
बूंदी जिले का खटकर गांव कोटा से करीब 65 किलोमीटर दूर है. कुछ साल पहले तक यहां की महिलाओं का जीवन घर और खेत तक ही सीमित था. सावित्री गौर भी इन्हीं महिलाओं में शामिल थीं. वह खेतों में काम करती थीं, लेकिन बाहर के लोगों से बात करने में झिझकती थीं. घूंघट में रहने वाली सावित्री की पहचान भी गांव की दूसरी महिला किसानों की तरह ही थी. लेकिन साल 2009 में उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया. क्षेत्र में काम करने वाली संस्था सृजन (Srijan) के सहयोग से सावित्री महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं. यह समूह महिला किसानों को खेती की बेहतर तकनीक और उत्पादन बढ़ाने की जानकारी देने का काम करता था.
सावित्री ने सबसे पहले सोयाबीन की खेती को बेहतर बनाने के तरीके सीखे. खेती से जुड़ी जानकारी मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा. वह सिर्फ खुद खेती करने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि दूसरी महिला किसानों को भी खेती के बारे में समझाने लगीं. धीरे-धीरे उन्होंने किसानों को ट्रेनिंग देना शुरू किया. वह खेतों में जाकर महिलाओं से बात करतीं और उन्हें बेहतर उत्पादन, फसल की गुणवत्ता और बाजार की जानकारी देतीं. इसी सफर में वह एक ऐसी महिला किसान नेता बन गईं, जिनकी बात दूसरे किसान भी ध्यान से सुनने लगे.
सावित्री की मेहनत का सफर आगे बढ़ा और वह समृद्धि महिला क्रॉप प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड की चेयरपर्सन बनीं. इस किसान उत्पादक कंपनी यानी FPO से 2310 महिला किसान जुड़ी हैं. इस कंपनी की शुरुआत साल 2011 में हुई थी. इसका मुख्य उद्देश्य किसानों की फसल को बेहतर तरीके से बाजार तक पहुंचाना और उन्हें उनकी उपज का अच्छा मूल्य दिलाने में मदद करना था. कंपनी से जुड़ी ज्यादातर महिलाएं सोयाबीन, उड़द, गेहूं और सरसों जैसी फसलों की खेती करती हैं.
FPO ने किसानों की उपज के बेहतर मार्केटिंग के लिए Bunge के साथ भी समझौता किया. इससे महिला किसानों को अपनी फसल को व्यवस्थित तरीके से बाजार तक पहुंचाने और उसकी बिक्री के बारे में बेहतर जानकारी मिलने लगी. लेकिन इस सफर में मुश्किलें भी कम नहीं थीं. साल 2015 में लगातार दो बार फसल खराब होने से FPO के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई. कमजोर मॉनसून के कारण फसल उत्पादन प्रभावित हुआ और कंपनी पर कर्ज का बोझ बढ़ने लगा.
2015 का समय FPO के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था. लगातार फसल खराब होने से कई किसान कर्ज वापस करने की स्थिति में नहीं थे. ऐसे समय में सावित्री ने हार नहीं मानी. वह एक खेत से दूसरे खेत तक गईं और किसानों से बात की. उन्होंने महिला किसानों का हौसला बढ़ाया और उन्हें कर्ज चुकाने के लिए प्रेरित किया. इस मुश्किल दौर में उनका नेतृत्व FPO के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा.
सावित्री खेती में नई तकनीक और बाजार की नई व्यवस्था को समझने के लिए हमेशा तैयार रहती थीं. इसी दौरान उन्होंने फसल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचने के लिए फ्यूचर्स मार्केट के बारे में जानकारी ली. सृजन के सहयोग से सावित्री और FPO से जुड़ी अन्य महिला किसानों ने एक्सचेंज प्लेटफॉर्म पर सोयाबीन और सरसों की फसल की बिक्री से जुड़ी प्रक्रिया को समझा. सितंबर 2016 में उन्होंने पहली बार 10 मीट्रिक टन सोयाबीन का नवंबर कॉन्ट्रैक्ट बेचकर एक्सचेंज प्लेटफॉर्म पर डिलीवरी की. इसके बाद उन्होंने 40 मीट्रिक टन सरसों के अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट में भी कारोबार किया. इन शुरुआती सौदों से किसानों को इस पूरी प्रक्रिया को समझने और बाजार के जोखिम से निपटने का अनुभव मिला.
सावित्री और उनकी FPO ने सिर्फ फसल बेचने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि फसल की गुणवत्ता सुधारने पर भी काम किया. इसके लिए कंपनी ने स्पाइरल ग्रेडर जैसी मशीनों में निवेश किया. महिला किसानों को फसल की गुणवत्ता जांचने और अच्छी-बुरी उपज को अलग करने की ट्रेनिंग भी दी गई. इससे बेहतर गुणवत्ता वाली फसल को बाजार में बेहतर मूल्य दिलाने की कोशिश की गई.
आज सावित्री के लिए खेती सिर्फ खेत में फसल उगाने तक सीमित नहीं है. वह बाजार की कीमतों पर भी नजर रखती हैं. अपने मोबाइल फोन पर वह NCDEX के भाव चेक करती हैं और बाजार की स्थिति को समझने की कोशिश करती हैं. यानी जिस महिला को कभी बाहर के लोगों से बात करने में झिझक होती थी, आज वह बाजार, फसल की कीमत और आधुनिक कृषि व्यवस्था को समझकर दूसरे किसानों का नेतृत्व कर रही हैं.
सावित्री गौर का सफर एक छोटे से गांव से शुरू हुआ था. खेती से जुड़ी जानकारी और लगातार सीखने की इच्छा ने उन्हें आगे बढ़ाया. आज वह सिर्फ अपने गांव की महिला किसानों के बीच ही नहीं, बल्कि देशभर में आयोजित होने वाले कृषि और किसान कार्यक्रमों में भी अपने अनुभव साझा करती हैं. उनकी कहानी यह बताती है कि ग्रामीण महिलाओं को अगर सही प्रशिक्षण, बाजार की जानकारी और काम करने का अवसर मिले तो वे खेती के साथ-साथ नेतृत्व की भूमिका भी निभा सकती हैं.
सावित्री के मुताबिक, आज उनके साथ जुड़ी महिलाएं अपनी फसल बेचने और उसकी कीमत को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हैं. उन्हें यह समझ आने लगा है कि फसल कटने के बाद उसे कब और किस तरह बाजार में बेचना है. सोयाबीन की 10 मीट्रिक टन फसल के साथ शुरू हुआ यह सफर उनके लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा. उनके अनुसार, बाजार और फसल की कीमत को समझने से किसानों को अपनी उपज से बेहतर कमाई का रास्ता मिला है.
सावित्री गौर की कहानी सिर्फ एक महिला किसान की सफलता की कहानी नहीं है. यह राजस्थान की उन हजारों ग्रामीण महिलाओं के बदलते आत्मविश्वास की कहानी भी है, जिन्होंने खेती को सिर्फ मेहनत का काम नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान का जरिया बनाया.
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