किसान शहंशाह आलमउत्तर प्रदेश के सहारनपुर के नानौता क्षेत्र के प्रोफेसर-किसान शहंशाह आलम ने पारंपरिक खेती छोड़ ‘भारत सुंदरी’ लाल बेर की वैरायटी अपनाकर अपनी आय लगभग दोगुनी कर ली है। कोलकाता से मंगाए गए पौधों से तैयार यह गहरे लाल रंग का मीठा बेर शिवरात्रि और होली के दौरान 80–100 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। बेहतर रंग, स्वाद और बढ़ती बाजार मांग के कारण यह वैरायटी क्षेत्र के किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनती जा रही है।
उत्तर प्रदेश में सहारनपुर के नानौता क्षेत्र के किसान शहंशाह आलम ने परंपरागत खेती से अलग हटकर नई फसलों का प्रयोग किया है और बड़ी सफलता हासिल की है. पेशे से प्रोफेसर होने के बावजूद पिछले दस वर्षों से वह बागवानी में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं. इस बार उन्होंने बेर की खास वैरायटी भारत सुंदरी को अपने खेत में लगाया है, जो दिखने में लाल और बेहद आकर्षक है. शहंशाह आलम को इस वैरायटी का आइडिया यूट्यूब के जरिए मिला. पहले वह हरे रंग के पारंपरिक बेर उगाते थे, लेकिन मंडी में कम दाम मिलने से उन्होंने बदलाव का फैसला लिया. अपनी आय बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने कोलकाता से पौधे मंगवाकर करीब डेढ़ सौ पौधे लगाए.
भारत सुंदरी बेर की खासियत यह है कि इसका रंग गहरा लाल होता है, जो ग्राहकों को दूर से ही आकर्षित करता है. स्वाद में यह बेहद मीठा होता है और बाजार में हरे बेर की तुलना में 20 से 30 रुपये प्रति किलो अधिक दाम पर बिकता है. जहां सामान्य बेर 50 से 60 रुपये किलो बिकता है, वहीं यह वैरायटी 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. किसान का कहना है कि एक साल बाद ही पौधे फल देना शुरू कर देते हैं. उन्होंने इसे 10 बाय 10 की दूरी पर लगाया था, लेकिन पौधे तेजी से फैलकर पूरे खेत में छा गए.
शहंशाह आलम बताते हैं कि इस वैरायटी के पेड़ को हर साल जमीन से लगभग एक फीट ऊपर से काटना पड़ता है. कटाई के छह महीने के भीतर ही पौधा फिर से तेजी से बढ़कर फल देने लगता है. इसकी टहनियां तेजी से फैलती हैं और फलन भी भरपूर होती है. लाल रंग और अधिक मिठास के कारण इसकी मांग लगातार बनी रहती है. खासकर शिवरात्रि और होली के आसपास इसकी डिमांड काफी बढ़ जाती है, क्योंकि मंदिरों में चढ़ाने के लिए लाल बेर को ज्यादा पसंद किया जाता है.
किसान शहंशाह आलम का कहना है कि उनकी पूरी फसल बागवान पहले ही खरीद लेते हैं और फिर बाजार में सप्लाई करते हैं. उनका दावा है कि इस नई वैरायटी से उनकी आय लगभग दोगुनी हो गई है. अब आसपास के किसान भी उनसे प्रेरित होकर परंपरागत खेती से हटकर नई फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. शहंशाह आलम मानते हैं कि अगर किसान नई तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म से सीख लेकर प्रयोग करें, तो खेती को मुनाफे का बेहतर जरिया बनाया जा सकता है.
शहंशाह आलम का कहना है कि शिवरात्रि के अवसर पर मंदिरों में लाल बेर चढ़ाने की परंपरा के कारण इसकी मांग काफी बढ़ जाती है. इस दौरान बागवान विशेष देखभाल करते हैं ताकि फल की क्वालिटी और मिठास बेहतर रहे. उन्होंने बताया कि बाजार में यह लाल बेर 80 से 90 रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है, जो सामान्य हरे बेर से 20–25 रुपये अधिक है. किसान सीधे पूरे खेत का सौदा व्यापारियों से कर देते हैं, जो बाद में इसे मंडियों और बाजारों में सप्लाई करते हैं.
किसान का मानना है कि लाल रंग और अधिक मिठास के कारण ग्राहक खुद इस फल की ओर आकर्षित होते हैं. इसी वजह से ‘भारत सुंदरी’ वैरायटी उन्हें सामान्य किस्मों की तुलना में अधिक मुनाफा दिला रही है. त्योहारी सीजन में बढ़ती मांग और बेहतर दाम के चलते यह वैरायटी क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी आय बढ़ाने का एक अच्छा विकल्प बनकर उभर रही है.
उन्होंने यह भी बताया कि इस बेर की खेती में हर साल पौधों को जमीन से काटकर दोबारा तैयार करना पड़ता है. पौधों की टहनियां तेजी से बढ़ती हैं और आपस में उलझ जाती हैं, जिससे घना फैलाव हो जाता है. फल भी भरपूर मात्रा में लगते हैं.
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