
पहले दिन किसानों ने खरीदे 650 क्विंटल बीजमेरठ में बासमती बीज वितरण मेला और किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में किसानों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम का आयोजन बासमती निर्यात विकास फाउंडेशन (BEDF), एपीडा और वाणिज्य मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से किया गया. इस आयोजन में पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और जम्मू क्षेत्र से 800 से अधिक किसान शामिल हुए. मेले के पहले दिन ही किसानों के बीच खासा उत्साह देखने को मिला और करीब 650 क्विंटल बासमती बीज बांटे गए, जिसकी कुल कीमत लगभग 60 लाख रुपये रही. अधिकारियों ने बताया कि बीज वितरण का यह अभियान आगे भी जारी रहेगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसानों तक उन्नत किस्मों का बीज पहुंचाया जा सके.
मेले में किसानों को पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1885, पूसा-1 और पूसा बासमती 1401 जैसी उन्नत किस्मों के बीज उपलब्ध कराए गए. विशेषज्ञों का कहना है कि इन किस्मों से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार संभव है, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी है.
मेले का उद्घाटन मुख्य अतिथियों की उपस्थिति में किया गया, जिनमें डॉ. सुनील तिवारी, डॉ. संतोष कुमार सचान, डॉ. सत्येंद्र खारी, डॉ. रितेश शर्मा, डॉ. आर.के. सिंह और डॉ. नीलेश चौरेसिया शामिल थे. इस दौरान चयनित प्रगतिशील किसानों को इनोवेटिव फार्मर अवार्ड देकर सम्मानित किया गया. सम्मानित किसानों में धर्मवीर सिंह, धीरज कुमार, हरेंद्र सिंह प्रधान, बुद्ध सिंह, आदित्य, तेजपाल सिंह, विकास और अजय प्रमुख रहे.

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों और बेहतर उत्पादन के उपायों की जानकारी दी. बासमती निर्यात विकास फाउंडेशन के संयुक्त निदेशक ने कहा कि भारत में बासमती चावल का निर्यात विदेशी मुद्रा अर्जित करने का बड़ा स्रोत है और इसकी गुणवत्ता सीधे बीज पर निर्भर करती है. उन्होंने बताया कि एपीडा किसानों को उच्च गुणवत्ता का बीज उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है.
डॉ. रितेश शर्मा ने किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन की तकनीक समझाई, ताकि वे खुद बीज उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकें. वहीं, डॉ. नीलेश चौरेसिया ने फसलों में संतुलित मात्रा में कीटनाशकों के उपयोग पर जोर दिया. अन्य विशेषज्ञों ने मृदा स्वास्थ्य, फसल चक्र और बागवानी प्रबंधन से जुड़े विषयों पर विस्तार से जानकारी दी.
इस आयोजन में कई वैज्ञानिकों, अधिकारियों और सहयोगी सदस्यों की सक्रिय भागीदारी रही, जिससे कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संचालित किया गया. आयोजकों का मानना है कि इस तरह के कार्यक्रम किसानों को नई तकनीक और बेहतर संसाधनों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
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