scorecardresearch
फसलों के लिए मुख्य पोषक तत्व क्यों है जरूरी, क्या हैं इसकी कमी के लक्षण और प्रभाव?

फसलों के लिए मुख्य पोषक तत्व क्यों है जरूरी, क्या हैं इसकी कमी के लक्षण और प्रभाव?

फसल उत्पादन में वृद्धि और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की संतुलित आपूर्ति अहम है. मृदा में पोषक तत्वों की कमी फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है. इसलिए, यह जानना जरूरी है कि प्रत्येक पोषक तत्व का क्या काम है और उसकी कमी से फसलों पर क्या असर पड़ता है.

advertisement
फसलों के लिए पोषक तत्वों की कमी बड़ी समस्या है फसलों के लिए पोषक तत्वों की कमी बड़ी समस्या है

भारत में बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए खाद्यान्न और खाद्य तेलों के उत्पादन में वृद्धि जरूरी है. कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल सीमित है, इसलिए प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादन बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. यह मृदा उर्वरता के उचित प्रबंधन द्वारा ही संभव है. मृदा में किसी खास पोषक तत्व की कमी हो तो उसकी आपूर्ति जैविक खादों और रासायनिक उर्वरकों से की जानी चाहिए. अन्यथा इसका मृदा उर्वरता और उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. इसलिए अपनी मृदा को समझना और उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखना अत्यंत जरूरी है. इसके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहकर अपने भोजन और पोषण को सुनिश्चित करें, अगर मृदा के स्वास्थ्य में गिरावट आई तो उपज में गिरावट निश्चित है. इसलिए इसकी कमी के संकेतों की पहचान करना और उपाय करना जरूरी है. 

मृदा में जैविक कार्बन की कमी

आईसीएआर-आरसीईआर, पटना में भूमि एवं जल प्रबंधन विभाग के हेड डॉ आशुतोष उपाध्याय ने बताया कि हमारे देश की मृदा में जैविक कार्बन की कमी है. हरित क्रांति के बाद उत्पादन में लगभग 50 फीसदी वृद्धि उर्वरकों के कारण हुई है, लेकिन असंतुलित पोषक तत्वों के उपयोग और जैविक खादों की उपेक्षा के कारण मृदा में कई पोषक तत्वों की कमी हो गई है. हम हर वर्ष मृदा से 340 लाख टन पोषक तत्वों का दोहन करते हैं, लेकिन केवल 260 लाख टन ही मृदा में वापस डालते हैं.

ये भी पढ़ें: kinnow farming: यूपी में पंजाब के मुकाबले बेहद कम मिल रहा किन्नू का भाव, परेशानी में किसान

इसका मतलब है कि हर वर्ष मृदा में 80 लाख टन पोषक तत्वों की कमी हो रही है. देश में पोषक तत्वों की कमी का आंकड़ा यह बताता है कि नाइट्रोजन में 95 फीसदी, फॉस्फोरस में 94 फीसदी, पोटाश में 48 फीसदी, सल्फर में 25 फीसदी, जिंक में 41 फीसदी, बोरान में 20 फीसदी, आयरन में 14 फीसदी, मैंगनीज में 8 फीसदी और कॉपर में 6 फीसदी की कमी है. एक तत्व की कमी दूसरे तत्व के उपयोग में बाधा उत्पन्न करती है, जिससे फसल उत्पादकता कम हो जाती है.

फसल विकास के लिए उर्वरता अहम

डॉ आशुतोष उपाध्याय ने बताया कि मृदा उर्वरता से मतलब उसकी उस क्षमता से है जो पौधे की वृद्धि और विकास के लिए जरूरी सभी पोषक तत्वों को संतुलित मात्रा में उपलब्ध करा सके. पौधों को अपनी वृद्धि के लिए 17 पोषक तत्वों की जरूरत होती है. इनमें से प्रमुख तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश हैं. इनमें से प्रथम तीन तत्व पौधे वायुमंडल से ग्रहण करते हैं. नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश को पौधे अधिक मात्रा में ग्रहण करते हैं. इन्हें खाद-उर्वरक के रूप में प्रदान करना जरूरी है. डॉ उपाध्याय ने जानकारी दी कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की कमी से पौधों पर निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं. इन पोषक तत्वों का मुख्य कार्य इस प्रकार है. अगर कमी हो जाए तो पौधे में ये लक्षण दिखाई जाते हैं, जिन्हें देखकर पहचाना जा सकता है कि किस पोषक तत्व की कमी है.

फसलों के लिए नाइट्रोजन क्यों है जरूरी?

फसल में प्रोटीन निर्माण पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करना, वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा देना, अनाज और चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाना, दानों के बनने में मदद करता है. अगर नाइट्रोजन की कमी हो जाती है तो पौधों में प्रोटीन की कमी होना, हल्के रंग का दिखाई देना, निचली पत्तियां पीली पड़ना, पौधे की बढ़वार रुकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना, फलों का गिरना, पौधे का बौना दिखाई देना, फसल का जल्दी पकना इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं.

फॉस्फोरस की कमी पौधों में नहीं होने दें

फसल के लिए फास्फोरस बहुत अहम है. कोश विभाजन शीघ्र होना, प्रकाश संश्लेषण में सहायक होना, बीज स्वस्थ पैदा करना और अनाज का भार बढ़ाना, फसल में रोग और कीटरोधकता बढ़ाना, जड़ें तेजी से विकसित और मजबूत करना, पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ाना, फल शीघ्र आना और दाने शीघ्र पकना इत्यादि काम में फास्फोरस का अहम रोल होता है. इसकी कमी से पौधे में पौधे छोटे रहना, पत्तियों का रंग हल्का बैंगनी या भूरा होना, निचली पत्तियों पर कमी दिखाई देना, पत्तियां नीले हरे रंग की होना, जड़ों की वृद्धि और विकास कम होना, पौधे के तने का गहरा पीला पड़ना, फल और बीज का निर्माण सही न होना, आलू की पत्तियां प्याले के आकार की होना इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं.

फसल में पोटाश भी बेहद जरूरी 

फसलों के लिए पोटाश बेहद जरूरी है क्योंकि यह पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता और सूखने से बचाता है. इसके अलावा कीट और रोग प्रतिरोधकता बढ़ाना, पौधे को गिरने से बचाना, स्टार्च और शक्कर के संचरण में मदद करना,  प्रोटीन के निर्माण में सहायक होना, अनाज के दानों में चमक पैदा करना, फसल की गुणवत्ता में वृद्धि करना, आलू और सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करना, सब्जियों के पकने के गुण को सुधारना, मृदा में नाइट्रोजन के कुप्रभाव को दूर करना जैसे कार्य के लिए पोटाश की जरूरत पड़ती है.

ये भी पढ़ें: सोलापुर में 24 बोरी प्याज के मिले 557 रुपये, पढ़िए इस किसान की दुखभरी कहानी

अगर इसकी कमी हो जाए तो पौधों की पत्तियां भूरी और धब्बेदार हो जाती हैं. पत्तियों के किनारे और सिरे झुलसे दिखाई देते हैं. मक्का के भुट्टे छोटे और नुकीले हो जाते हैं. इसके अलावा आलू में कंद छोटे होना, पौधे की जड़ों का विकास कम होना, प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया कम और श्वसन की क्रिया अधिक होना शुरू हो जाता है जिससे पौधे मुरझा जाते हैं.

इस प्रकार, मृदा की उर्वरता बनाए रखने के लिए विभिन्न पोषक तत्वों की कमी को दूर करना जरूरी है. संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग और जैविक खादों का समुचित प्रयोग मृदा की उर्वरता और फसल उत्पादन को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं.