पाकिस्तान में महंगी खाद से किसान परेशान (सांकेतिक फोटो)हाल के कुछ सालों में दुनियाभर में रासायनिक खादों, कीटनाशक की कीमतें बढ़ने से खेती की लागत बढ़ी है. लेकिन, पाकिस्तान में हालात और भी गंभीर है. यहां का कृषि क्षेत्र बढ़ती लागत के दबाव में गंभीर संकट से गुजर रहा है. किसानों के लिए खेती का खर्च लगातार बढ़ रहा है, जिससे उत्पादन और आमदनी पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है. ‘समा टीवी’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान किसान इत्तेहाद के अध्यक्ष खालिद महमूद खोखर ने कृषि क्षेत्र की मौजूदा स्थिति के लिए कमजोर नीतियों और शासन व्यवस्था की खामियों को जिम्मेदार बताया है.
लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज में आयोजित नेशनल पॉलिसी डायलॉग में खोखर ने किसानों पर बढ़ते आर्थिक दबाव का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में DAP खाद की कीमत करीब 17,500 पाकिस्तानी रुपये है, जबकि यूरिया की कीमत लगभग 4,600 रुपये तक पहुंच गई है. खाद के अलावा बिजली समेत दूसरे कृषि इनपुट महंगे होने से किसानों की कुल उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है.
खोखर ने कहा कि मौजूदा लागत के साथ पाकिस्तान के किसानों के लिए दूसरे देशों के किसानों से प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो गया है. महंगी बिजली और कृषि सामग्री खेती की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है. समा टीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, खोखर ने कहा कि किसानों पर इतना वित्तीय दबाव है कि वे खेती से होने वाली कमाई से अपने परिवार की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें भी आसानी से पूरी नहीं कर पा रहे हैं.
पाकिस्तान के कृषि संकट का असर कपास उत्पादन पर भी दिखाई दे रहा है. खोखर के मुताबिक, देश में कपास का उत्पादन घटकर करीब 55 लाख गांठ रह गया है. उन्होंने इस गिरावट के लिए किसानों को जिम्मेदार ठहराने के बजाय नीतिगत और संस्थागत विफलताओं को प्रमुख कारण बताया. उन्होंने कहा कि बेहतर नीतियों और प्रभावी प्रशासन के जरिए कृषि उत्पादन को दोबारा मजबूत किया जा सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, खोखर ने पाकिस्तान के कृषि घाटे के करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंचने का दावा किया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के पास उपजाऊ जमीन, नदियां, विविध जलवायु, जंगल और खनिज जैसे पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन हैं, लेकिन कमजोर शासन व्यवस्था के कारण इनका पूरा आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा है.
खोखर ने कहा कि पाकिस्तान को कृषि क्षेत्र की मौजूदा परेशानियों से बाहर निकालने के लिए तत्काल संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है. जब तक नीतियों, संस्थागत व्यवस्था और सरकारी व्यवस्था में बुनियादी बदलाव नहीं किए जाते, तब तक किसानों पर लागत का दबाव बना रहेगा और कृषि क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर होती जाएगी. (एएनआई)
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