कश्मीर में दो नई धान किस्में तैयार (सांकेतिक तस्वीर)कश्मीर घाटी में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए दो नई किस्में बेहतर उत्पादन और अतिरिक्त कमाई की संभावना लेकर आई हैं. शालीमार-4 और शालीमार-5 नाम की इन नई धान किस्मों ने करीब 7.2 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार दर्ज की है. यह पैदावार राष्ट्रीय औसत से लगभग ढाई गुना अधिक है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन किस्मों से सीमित जमीन वाले किसान कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन हासिल कर सकते हैं. इन दोनों किस्मों को शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी-कश्मीर के अंतर्गत खुडवानी स्थित माउंटेन रिसर्च सेंटर फॉर फील्ड क्रॉप्स यानी एमआरसीएफसी ने तैयार किया है.
'बिजनेसलाइन' की रिपोर्ट के मुताबिक, एमआरसीएफसी के एसोसिएट डायरेक्टर नजीब-उल-रहमान सोफी ने कहा कि शालीमार-4 किस्म को मैदानी इलाकों के लिए बनाया गया है. वहीं, शालीमार-5 को ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्रों की जलवायु और खेती की परिस्थितियों के अनुकूल तैयार किया गया है.
एमआरसीएफसी के आंकड़ों के मुताबिक, नई किस्मों से लगभग 7.2 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिला है. यह देश में धान की औसत पैदावार के मुकाबले करीब 2.5 गुना ज्यादा है. कश्मीर के ग्रामीण परिवारों के लिए धान अभी भी एक महत्वपूर्ण फसल है, ऐसे में अधिक उत्पादन देने वाली किस्में किसानों की आय बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं.
शालीमार-4 और शालीमार-5 दोनों किस्मों को ब्लास्ट रोग के प्रति प्रतिरोधी बताया गया है. ब्लास्ट एक फफूंद जनित बीमारी है, जो धान की फसल को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है और उत्पादन में बड़ी गिरावट ला सकती है. रोग प्रतिरोधक क्षमता होने से किसानों को फसल बचाने के लिए अतिरिक्त खर्च और उत्पादन जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है.
इन नई किस्मों की एक खासियत इनका अपेक्षाकृत कम फसल चक्र है. नजीब-उल-रहमान सोफी ने बताया कि किसान इन किस्मों की फसल 15 सितंबर से 25 सितंबर के बीच काट सकते हैं. सामान्य किस्मों की तुलना में जल्दी कटाई होने से खेत अगले फसल चक्र के लिए पहले खाली हो सकेंगे. इससे किसानों के पास उसी जमीन पर दूसरी फसल लेने का अवसर पैदा हो सकता है.
कश्मीर में खेती योग्य जमीन लगातार कम हो रही है, इसलिए उपलब्ध कृषि भूमि का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1996 से 2023 के बीच क्षेत्र में करीब 34,000 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि कम हो चुकी है. ऐसे में अधिक पैदावार और कम समय में तैयार होने वाली धान की किस्में सीमित जमीन से बेहतर आय निकालने का विकल्प दे सकती हैं.
वैज्ञानिकों ने बतया कि नई किस्मों की उपयोगिता केवल अनाज उत्पादन तक सीमित नहीं है. इन किस्मों से मिलने वाले कुल बायोमास में लगभग आधा हिस्सा दाना और बाकी हिस्सा पुआल का होता है. कश्मीर में धान के पुआल की अच्छी उपयोगिता और बाजार मूल्य है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय मिल सकती है.
कश्मीर में धान के पुआल का इस्तेमाल सेब के कार्टन की पैकिंग में कुशनिंग सामग्री के रूप में किया जाता है. इसके अलावा सर्दियों के दौरान इसे पशुओं के चारे के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है. किसान धान का अनाज बेचने के साथ-साथ पुआल की बिक्री से भी कमाई कर सकते हैं.
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