Heat protection: मार्च की गर्मी ने बढ़ाई गेहूं किसानों की धड़कन, पैदावार घटने का डर, वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपाय

Heat protection: मार्च की गर्मी ने बढ़ाई गेहूं किसानों की धड़कन, पैदावार घटने का डर, वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपाय

उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत में मार्च की शुरुआत से ही पारा 35 डिग्री के पार पहुच गया है, जिसने गेहूं किसानों की चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय बढ़ती गर्मी 'हीट स्ट्रेस' पैदा कर सकती है, जिससे गेहूं के दाने समय से पहले सूखकर पिचक सकते हैं और पैदावार में भारी कमी आ सकती है. इस परेशानी से बचने के लिए पूसा के कृषि वैज्ञानिकों ने घबराने के बजाय कुछ जरूरी उपाय अपनाने की सलाह दी है.

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मार्च की गर्मी ने बढ़ाई गेहूं किसानों की धड़कन, पैदावार घटने का डर, वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपायगेहूं पर गर्मी की मार

इस साल उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों में मौसम के मिजाज ने किसानों को गहरी चिंता में डाल दिया है. फरवरी के महीने में अच्छी ठंड पड़ने की वजह से सभी किसानों को उम्मीद थी कि इस बार गेहूं और सरसों की पैदावार पिछले कई सालों का रिकॉर्ड तोड़ देगी और खेतों में बंपर फसल लहलहाएगी. लेकिन मार्च की शुरुआत होते ही सूरज के तेवर अचानक बेहद तल्ख हो गए हैं और उत्तर भारत के कई हिस्सों में पारा अभी से 35 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर चुका है. मौसम विभाग की ताजा चेतावनी ने इस डर को और बढ़ा दिया है, जिसमें कहा गया है कि आने वाले पांच-छह दिनों में तापमान बढ़ सकता है.

गेहूं की फसल के लिए मार्च का यह समय सबसे ज्यादा अहम यानी 'गोल्डन पीरियड' होता है, क्योंकि इसी दौरान पौधों की बालियों में दाने भरने और उनमें दूध बनने की प्रक्रिया सबसे तेज गति से चलती है. ऐसे नाजुक समय में अचानक बढ़ी यह गर्मी गेहूं के पौधों के लिए 'हीट स्ट्रेस' या तापीय तनाव जैसी स्थिति पैदा कर देती है. जब तापमान लगातार 35 डिग्री से ऊपर बना रहता है, तो पौधों में परागण और दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित होती है जिससे दाने सिकुड़ जाते हैं और कम बनते हैं. इससे गेहूं की पैदावार घट जाती है.

तापमान का खेल और वैज्ञानिकों की सलाह

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) पूसा दिल्ली के मुख्य वैज्ञानिक और गेहूं फसल के विशेषज्ञ राजबीर सिंह का कहना है कि वर्तमान में तापमान 32 से 33 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है, जो फिलहाल फसल के लिए बहुत ज्यादा खतरे वाली बात नहीं है. इसलिए किसानों को घबराने के बजाय सावधानी पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया है कि जैसे ही पारा 35 डिग्री के पार पहुंचता है, गेहूं के दानों में दूध भरने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होने लगती है. ऐसी स्थिति में गर्मी के कारण दाने पूरी तरह से पुष्ट और विकसित नहीं हो पाते, जिससे वे आकार में छोटे रह जाते हैं और सूखकर पिचक जाते हैं.

जब दाना हल्का होगा, तो कुल पैदावार घट जाएगी.  इस 'हीट स्ट्रेस' से फसल को बचाने का सबसे बढ़िया और सरल तरीका है खेत में लगातार नमी बरकरार रखी जाए. इसके लिए शाम के समय हल्की सिंचाई जरूर करें. शाम को पानी देने से फायदा यह होता है कि रात भर खेत की मिट्टी ठंडी रहती है और फसल के आसपास का तापमान कम बना रहता है. बस सिंचाई करते समय यह ध्यान रखें कि हवा तेज न चल रही हो, वरना आपकी खड़ी फसल गिर सकती है जिससे भारी नुकसान हो सकता है.

किसान गेहूं की फसल पर रखें पैनी नजर

फसल को अचानक बढ़ी गर्मी से सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिक म्यूरेट ऑफ पोटाश के छिड़काव की सलाह भी देते हैं. इसके लिए लगभग 250 ग्राम पोटाश को सवा सौ लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें. यह घोल पौधों के लिए एक 'सुरक्षा कवच' का काम करता है जो उन्हें तपती धूप और लू से लड़ने की ताकत देता है. इसके साथ ही, इस गर्म मौसम में 'पीला रतुआ' जैसी घातक बीमारी का खतरा भी काफी बढ़ जाता है. इसलिए पौधों की पत्तियों को ध्यान से देखें. अगर पत्तियों पर हल्दी जैसा पीला पाउडर दिखाई दे, जो हाथ लगाने या कपड़ों पर रगड़ने से चिपक जाए, तो समझ लें कि संक्रमण शुरू हो चुका है. इसलिए पीला रतुआ के लक्षण दिखते ही तुरंत 'प्रोपिकोनाज़ोल 'दवा प्रयोग करें. 

पिछले कड़वे अनुभवों से सीखें किसान

साल 2022 का कड़वा अनुभव हम सबके सामने है, जब मार्च में अचानक आई लू ने सरकार और किसानों के सारे अनुमानों पर पानी फेर दिया था. उस साल गेहूं का उत्पादन उम्मीद से बहुत कम रहा और पंजाब जैसे राज्यों में तो पैदावार में 13.5% तक की भारी गिरावट देखी गई थी. वर्तमान में यूपी और हरियाणा के किसानों के सामने वही पुरानी चुनौती दोबारा खड़ी है, इसलिए इस नाजुक समय में जरा सी लापरवाही पूरे साल की कमाई को डुबो सकती है.

भविष्य के लिए विशेषज्ञों का कहना है कि किसान भाइयों को अब 'जीरो टिलेज' यानी बिना जुताई की बुवाई वाली आधुनिक तकनीक की ओर बढ़ना चाहिए. इस तरीके में पुरानी फसल के अवशेषों को खेत में ही सतह पर फैला रहने दिया जाता है, जो तपती धूप में मिट्टी के लिए एक ठंडी चादर (मल्चिंग) की तरह काम करते हैं. ये अवशेष जमीन के तापमान को प्राकृतिक रूप से 1 से 2 डिग्री तक कम रखते हैं और सिंचाई के पानी को भी लंबे समय तक जमीन के भीतर रोक कर रखते हैं.

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