देश में मक्का किसानों की दुर्दशामक्का किसानों के लिए इस समय बड़ी और कड़वी खबर यह है कि जिस वादे के दम पर उन्हें 'ऊर्जादाता' बनाने का सपना दिखाया गया था, वह सरकारी नीतियों के चलते अब एक आर्थिक संकट में बदलता दिख रहा है. सरकार ने इथेनॉल बनाने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) के चावल के भंडार खोल दिए हैं. डिस्टिलरीज अब मक्के के बजाय सस्ते सरकारी चावल को वरीयता दे रही हैं, जिससे मक्के की मांग और दाम दोनों बुरी तरह गिर रहे हैं. कुल मिलाकर पिछले एक साल से सही दाम के लिए तरस रहे मक्का किसानों का दुख अभी दूर होता नहीं दिखाई दे रहा है. मक्का बनाम चावल की जंग में मक्के को मारने की साजिश रच दी गई है. अब यह मक्का किसानों को तय करना है कि वो इथेनॉल के लिए खेती बढ़ाएं या फिर दाम गिरने की संभावना को देखते हुए इसकी खेती से हाथ खींच लें.
दुनिया भर में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. सरकार अगले साल से FCI के भंडार से करीब 90 लाख टन टूटा चावल (ब्रोकन राइस) इथेनॉल इंडस्ट्री को देने की योजना बना रही है.
इसके लिए खाद्य मंत्रालय जल्द ही कैबिनेट के सामने प्रस्ताव रखेगा. प्रस्ताव के मुताबिक, फ्री राशन योजना (PDS) के तहत बांटे जाने वाले अनाज में टूटे चावल की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दी जाएगी. सरकार का कहना है कि इससे हर साल इथेनॉल सेक्टर को करीब 90 लाख टन अतिरिक्त टूटा चावल मिल सकेगा, जिसका इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में किया जाएगा.
सरकार का तर्क है कि यह कदम तेल आयात पर निर्भरता कम करने, इथेनॉल ब्लेंडिंग टारगेट हासिल करने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में मदद करेगा.
लेकिन सरकार की इस तैयारी से देश के मक्का किसानों की चिंता बढ़ गई है. किसानों का कहना है कि इथेनॉल नीति के तहत सरकार ने पिछले कुछ सालों में मक्के को बढ़ावा देने की अपील की थी.
किसानों से कहा गया कि ज्यादा मक्का उगाएं. मक्का आधारित इथेनॉल प्लांट लगाए गए और बेहतर कीमत मिलने का भरोसा दिया गया.
कई किसानों ने सरकार की बात मानकर मक्का की खेती का रकबा बढ़ाया और कुछ ने अच्छे दाम की उम्मीद में मक्का स्टोर भी कर लिया. अब सरकार का इथेनॉल के लिए मक्के से चावल की ओर झुकाव किसानों के लिए बड़ा झटका साबित हो रहा है.
इससे किसानों को डर है कि मक्के की मांग घटेगी, बाजार भाव गिरेंगे और स्टोर किया गया मक्का नुकसान में बिकेगा.
केवल मक्का ही नहीं, सरकार के इस फैसले का असर धान की खेती पर भी पड़ सकता है. जब इथेनॉल इंडस्ट्री को इतनी बड़ी मात्रा में चावल दिया जाएगा, तो स्वाभाविक तौर पर धान की मांग बढ़ेगी. इससे किसान इथेनॉल के लालच में ज्यादा से ज्यादा धान बोने लगेंगे. यह स्थिति सरकार की उसी पुरानी नीति के उलट जाती दिख रही है, जिसमें पानी ज्यादा खपत करने वाली धान की खेती कम करने और मक्का जैसी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने की बात की जाती रही है.
अब किसानों का कहना है कि अगर फिर से धान की खेती बढ़ी, तो ग्राउंडवाटर (भूजल) पर दबाव बढ़ेगा, मक्का का रकबा अपने आप घटेगा और मक्का किसानों का मुनाफा और कम होगा.
कृषि जानकारों और किसानों का मानना है कि इस नीति से मक्का की खेती आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकती है. अगर दाम नहीं मिले तो किसान मक्का छोड़ देंगे जिससे फसल विविधीकरण का लक्ष्य कमजोर होगा और सरकार की नीतियों में अंतर भी दिखेगा. किसानों का कहना है कि सरकार को इथेनॉल नीति में एक बैलेंस बनाना होगा, ताकि मक्का किसानों को नुकसान न हो, धान की अंधाधुंध खेती न बढ़े और पानी, जमीन और किसान तीनों की रक्षा हो सके.
अब सबकी नजर सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी है कि वह तेल की जरूरतों और किसानों के हित में किस तरह का बैलेंस बनाती है.
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी इथेनॉल के बहुत बड़े समर्थक माने जाते हैं. E-20 इथेनॉल भी उनकी देन है. वे कहते हैं कि बिहार में मक्का-आधारित इथेनॉल उत्पादन किसानों के लिए एक बड़ा सहारा बनकर उभरा है. उन्होंने कहा, “उत्तर प्रदेश और बिहार में मक्के की कीमतें काफी बढ़ गई है, और किसानों की जेब में लगभग 42,000 करोड़ रुपये आए, क्योंकि मक्के से इथेनॉल का उत्पादन शुरू हो गया.” गडकरी के मुताबिक इससे मक्के की खेती के रकबे में भी बढ़ोतरी हुई.
अब सवाल है कि जिस बिहार और यूपी में इथेनॉल बनाने के लिए किसानों को मक्के की खेती में बढ़ावा दिया गया, सरकार अब उन किसानों से क्या कहेगी? क्या ये कहा जाएगा कि वे मक्का नहीं, धान की खेती बढ़ाएं. अगर ऐसा कहा जाता है तो हरियाणा जैसे राज्यों की उस योजना का क्या, जहां धान की खेती नहीं करने के लिए किसानों को 7000 रुपये प्रति हेक्टेयर सब्सिडी दी जाती है.
ये सभी सवाल मक्का के भविष्य और किसानों को परेशान कर रहे हैं. सरकार के भरोसे में आकर किसान शिकार बना है क्योंकि उसे मक्के पर धोखा मिला है. कहां उसे ऊर्जादाता बनना था, लेकिन अभी वह खुद कई चुनौतियों से घिरा है. इथेनॉल के नाम पर चावल ने मक्के को ऐसा घेरा है कि इससे निकलने का आगे-पीछे कोई रास्ता नहीं है. मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसे सरकार का समर्थन हासिल है.
दरअसल, सरकार की फूड सिक्योरिटी स्कीम के तहत करीब 80 करोड़ लोगों को जो मुफ्त अनाज दिया जाता है, उसमें 25 प्रतिशत हिस्सा टूटे हुए चावल का होता है. नई योजना के तहत इस हिस्से को 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया जाएगा. इसके बाद हर साल फ्री राशन योजना में बांटे जाने वाले कुल 360–370 लाख टन अनाज में से जो अतिरिक्त टूटा चावल बचेगा, उसे नीलामी के जरिए इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों, पशु आहार कंपनियों और बाकी इंडस्ट्री को बेचा जाएगा.
सरकार ने इस योजना का ट्रायल पहले ही पांच राज्यों में पूरा कर लिया है. अगले साल से सरकार FCI के भंडार से डिस्टिलरी को साबुत चावल देना बंद कर देगी. इसकी जगह, टूटा चावल इथेनॉल बनाने में पूरे साल भरोसेमंद कच्चा माल (फीडस्टॉक) बनेगा. सवाल है, जब इथेनॉल के लिए चावल की इतनी मांग बढ़ेगी तो मक्के की खेती और उसकी उपज को कौन पूछेगा?
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today