ऊसर खेत में बंपर मिलेगी धान की पैदावारभारत के उत्तर-मैदानी इलाकों में नमक और क्षार से प्रभावित ऊसर जमीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा फैला हुआ है. इस मिट्टी का पीएच (pH) लेवल 8.5 से ऊपर होने के कारण आम फसलें यहां घुटने टेक देती हैं. लेकिन अब कृषि वैज्ञानिकों की नई खोजों ने किसानों की इस लाचारी को बड़ी ताकत में बदल दिया है. केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI) ने धान की कुछ ऐसी बेमिसाल आधुनिक किस्में तैयार की हैं, जो ऊसर और बंजर भूमि में भी सामान्य धान के मुकाबले 5% तक ज्यादा पैदावार देने की पूरी क्षमता रखती हैं. इनमें CSR 101, CSR 104 और CSR 105जैसी उन्नत किस्में शामिल हैं, जो खतरनाक बीमारियों, कीड़ों और कड़क क्षारीय पानी को आसानी से बर्दाश्त कर लेती हैं.
अगर आप ऊसर जमीन पर भी खुशबूदार और लंबे दानों वाली बासमती उगाने की हसरत रखते हैं, तो 'बासमती CSR 30' आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है. यह दुनिया की पहली ऐसी बासमती वैरायटी है जिसे खास तौर पर नमक प्रभावित इलाकों के लिए तैयार किया गया है. यह 9.5 pH तक की सोडिसिटी को बड़े आराम से झेल सकती है, इसीलिए यह यूपी, हरियाणा और पंजाब के किसानों की पहली पसंद बन चुकी है.
वहीं दूसरी ओर, अगर आपके खेत की जमीन हद से ज्यादा खराब हो चुकी है, तो 'CSR 10' उस बंजर जमीन के लिए एक बेहतरीन "जैविक सुधारक" का काम करती है. छोटे और मोटे दानों वाली यह किस्म भारी लवणता के बावजूद 3 टन प्रति हेक्टेयर तक का शानदार धान पैदा करके देती है.
वैज्ञानिकों ने किसानों की अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से कई और लाजवाब वैरायटियां भी तैयार की हैं. जैसे 'CSR 23' और 'CSR 27' ऐसी शानदार किस्में हैं जो सिर्फ 115 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं. इनके दाने लंबे-पतले होते हैं और ये खराब मिट्टी में भी 4 टन प्रति हेक्टेयर तक का बंपर उत्पादन देती हैं. इसी तरह यूपी और हरियाणा के लिए 'CSR 36' भी एक बेहतरीन किस्म है जो 140 दिनों में पकती है. वहीं अगर आप कम समय वाली फसल चाहते हैं, तो 'CSR 43' सिर्फ 110 दिनों में तैयार हो जाती है. इसके दाने छोटे और मोटे होते हैं, जो कम समय और कम पानी में भी नमक प्रभावित खेतों से 3.5 टन प्रति हेक्टेयर तक का धान निकालकर किसान की झोली भर देते हैं.
अक्सर किसान ऊसर खेतों में पारंपरिक तरीके से तैयार की गई कमजोर नर्सरी लगा देते हैं, जिससे पौधे मुख्य खेत में जाते ही दम तोड़ देते हैं. वैज्ञानिकों की हालिया रिसर्च के मुताबिक, अगर हम सही नर्सरी मैनेजमेंट अपनाएं तो पैदावार को बहुत आसानी से बढ़ाया जा सकता है. इसके लिए किसानों को नर्सरी में बीज की घनापन कम रखनी चाहिए, यानी प्रति वर्ग मीटर सिर्फ 25 ग्राम अंकुरित बीज ही बोएं. भारी मात्रा में बीज डालने से पौधों के बीच हवा, पानी और रोशनी की जंग शुरू हो जाती है, जिससे पौध पतली और कमजोर रह जाती है. कम बीज दर रखने से पौधों को पूरा पोषण मिलता है जिससे उनकी जड़ें और पत्तियां ज़्यादा मजबूत और सेहतमंद बनती हैं.
ऊसर भूमि से सोने जैसी फसल उगाने के लिए सिर्फ यूरिया काफी नहीं है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों के साथ देशी गोबर की खाद का मेल करना बेहद जरूरी है. ऊसर मिट्टी में नाइट्रोजन बहुत तेजी से गैस बनकर उड़ जाता है, इसलिए नर्सरी तैयार करते समय प्रति हेक्टेयर 5 टन गोबर की खाद के साथ 100 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस और 50 किलो पोटाश का सही अनुपात रखें.
इसके बाद, रोपाई वाले मुख्य खेत में 150 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस, 50 किलो पोटाश और 25 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से संतुलित खुराक दें. इसके साथ ही, रोपाई के लिए 30 दिन की उम्र के पौधे सबसे बेहतरीन परिणाम देते हैं. इस सही उम्र के पौधे लगाने से फसल की बढ़वार अच्छी होती है और किसानों को अपनी लागत के बदले दोगुने से भी ज्यादा का मुनाफा हासिल होता है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today