खेती में आया डिजिटल तूफानभारत में कृषि अब धीरे-धीरे एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर बढ़ रही है. इसे ही “एग्रीस्टैक” कहा जा रहा है, जो देश की खेती-किसानी के लिए एक मजबूत डिजिटल ढांचा तैयार कर रहा है. हाल के महीनों में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हुए बड़े फैसलों ने यह दिखा दिया है कि यह सिस्टम किसानों की मदद कितनी तेजी और पारदर्शिता से कर सकता है.
फरवरी 2026 में महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा काम किया. सरकार ने खरीफ फसल के नुकसान से प्रभावित करीब 89 लाख किसानों को सिर्फ पाँच दिनों में 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की राहत राशि जारी कर दी. यह काम पहले की तुलना में बहुत तेज और व्यवस्थित तरीके से हुआ. पहले ऐसे बड़े स्तर पर भुगतान करने में महीनों लग जाते थे, लेकिन अब डिजिटल सिस्टम की वजह से यह काम कुछ ही दिनों में पूरा हो गया.
इसके अगले महीने यानी मार्च 2026 में छत्तीसगढ़ सरकार ने धान की MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) खरीद प्रक्रिया को बहुत सफल तरीके से पूरा किया. इस प्रक्रिया में एक ही सीजन में 32 लाख से अधिक किसानों को कवर किया गया. यह संभव हुआ एक बेहतर डिजिटल व्यवस्था और डेटा सिस्टम की मदद से, जिससे किसानों की जानकारी और उनकी फसल की स्थिति तुरंत उपलब्ध हो सकी.
कुछ साल पहले तक भारत में कृषि व्यवस्था बहुत बिखरी हुई थी. किसानों की जमीन के रिकॉर्ड, फसल की जानकारी और सरकारी योजनाओं का डेटा अलग-अलग जगहों पर होता था. इसी कारण किसी भी योजना को लागू करने में समय लगता था और कई बार सही लाभ सही किसान तक नहीं पहुँच पाता था. लेकिन अब एग्रीस्टैक जैसे डिजिटल सिस्टम ने इस पूरी प्रक्रिया को बदलना शुरू कर दिया है.
एग्रीस्टैक को अक्सर UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के मॉडल से जोड़ा जाता है. जैसे UPI ने बैंकिंग को आसान और डिजिटल बना दिया, वैसे ही एग्रीस्टैक खेती-किसानी को एक डिजिटल नेटवर्क में जोड़ रहा है. यह सिस्टम तीन मुख्य चीजों पर काम करता है.
पहला, किसानों का एक डिजिटल पहचान रिकॉर्ड, जिसमें हर किसान और उसकी जमीन की जानकारी एक जगह जुड़ी होती है. दूसरा, फसल बोने का रिकॉर्ड, जिससे पता चलता है कि कौन सी फसल कहाँ और कब बोई गई है. तीसरा, गांवों का डिजिटल नक्शा, जिसमें जमीन की सही सीमाएँ और लोकेशन दर्ज होती हैं.
इस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह सही और तुरंत मिलने वाला डेटा देता है. पहले किसानों को लोन या सरकारी मदद लेने में बहुत समय लगता था क्योंकि कागज़ी जांच और सत्यापन में देरी होती थी. अब बैंक और सरकारी संस्थाएं किसान की जानकारी तुरंत देख सकती हैं.
इससे लोन प्रक्रिया तेज हो गई है और किसानों को जल्दी मदद मिल रही है. उदाहरण के लिए, किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत बिना गारंटी वाले लोन की सीमा बढ़ाकर 2 लाख रुपये तक कर दी गई है.
पहले कई बार एक ही जमीन पर गलत तरीके से कई लोन लिए जाने या गलत जानकारी देने की समस्या सामने आती थी. अब फसल की जानकारी डिजिटल सर्वे और रिकॉर्ड के जरिए तुरंत दर्ज होती है. इससे बैंक को पता चलता है कि किस खेत में कौन सी फसल लगी है और कितना लोन देना सुरक्षित रहेगा. इससे धोखाधड़ी की संभावना काफी कम हो गई है.
अब गांवों और खेतों को GPS आधारित डिजिटल मैप से जोड़ा जा रहा है. इसका मतलब है कि हर खेत की एक सही लोकेशन और सीमा तय है. अगर कोई कर्मचारी खेत का रिकॉर्ड दर्ज करता है, तो उसकी लोकेशन उसी खेत से मेल खानी चाहिए. इससे गलत रिपोर्टिंग और फर्जी डेटा की संभावना लगभग खत्म हो जाती है. अब तक लाखों गांवों का डिजिटल नक्शा तैयार किया जा चुका है.
इस पूरी व्यवस्था को इस तरह बनाया गया है कि हर किसान तक इसका लाभ पहुँच सके. जरूरी नहीं कि हर किसान के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट हो. इसके लिए गांवों में कॉमन सर्विस सेंटर, किसान सहायक और स्थानीय कार्यकर्ता मदद करते हैं. वे किसानों को इस सिस्टम से जोड़ते हैं ताकि कोई भी पीछे न रह जाए.
एग्रीस्टैक भारत की कृषि व्यवस्था को एक नई दिशा दे रहा है. यह सिर्फ एक तकनीकी सिस्टम नहीं बल्कि किसानों के जीवन को आसान बनाने वाला एक बड़ा बदलाव है. सही डेटा, तेज मदद और पारदर्शी व्यवस्था के जरिए यह सिस्टम खेती को एक भरोसेमंद और मजबूत डिजिटल अर्थव्यवस्था में बदल रहा है. आने वाले समय में यह भारत की कृषि को और अधिक आधुनिक और सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
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