खेती की लागत कम करने के लिए महाराष्ट्र में चला बड़ा अभियानमहाराष्ट्र के बीड जैसे सूखाग्रस्त जिले में गरीब और सीमांत किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए 'दिलासा संस्था' और 'एसबीआई फाउंडेशन' ने एक अनुकरणीय पहल की है. धारूर तहसील के 10 गांवों में चलाए जा रहे 'एसबीआई ग्राम सक्षम' अभियान के अंतर्गत खेती की लागत में 10 गुना तक की कमी आई है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल रही है.
आज के समय में डीजल की बढ़ती कीमतों के कारण ट्रैक्टर से एक एकड़ खेत की जुताई (Ploughing) का खर्च लगभग 2000 से 2500 रुपये आता है. लेकिन, इस अभियान के तहत स्थापित 'किसान सेवा केंद्रों' के माध्यम से यही काम मात्र 200 रुपये के पंजीकरण शुल्क में किया जा रहा है. साल 2023 से अब तक 1500 से अधिक किसानों ने इसका लाभ उठाया है, जिससे लगभग 2000 एकड़ जमीन की सफलतापूर्वक मशागत (जुताई) की गई है.
साल 2015 के भीषण सूखे के बाद धारूर तहसील के सबसे अधिक प्रभावित 10 गांवों—जिनमें हिंगणी, बोडखा, निमला, गावंदरा, तांदलवाड़ी मुख्य हैं—का चयन किया गया था. इन गांवों की सुविधा के लिए 5 किसान सेवा केंद्र बनाए गए हैं, जहां ट्रैक्टर, हल, रोटर और बुवाई के आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं.
किसानों को केवल मशीनी सहायता ही नहीं बल्कि तकनीकी ज्ञान देने के मकसद से साल 2025 में हिंगणी में एक भव्य 'किसान भवन' का निर्माण किया गया है. इस भवन के माध्यम से पारंपरिक और उन्नत बीजों का संरक्षण, वर्मीकंपोस्ट (गांडूल खत) निर्माण और रसायन मुक्त खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. कृषि विशेषज्ञों द्वारा खेती से जुड़ी समस्याओं का मौके पर समाधान दिया जा रहा है.
महात्मा गांधी के "गांव की ओर लौटें" के विचार को धरातल पर उतारते हुए दिलासा संस्था (यवतमाल) के कुशल नियोजन और एसबीआई फाउंडेशन (मुंबई) के आर्थिक सहयोग ने इन गांवों की तस्वीर बदल दी है. धारूर तहसील के ये गांव अब 'सुजलाम-सुफलाम' होने की राह पर हैं और इस मॉडल की हर तरफ सराहना हो रही है.
प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच ही 198 किसानों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. आंकड़ों का विश्लेषण करें तो बीड जिले में औसतन हर 36 घंटे में एक किसान मौत को गले लगा रहा है. विशेष रूप से खरीफ सीजन के दौरान और उसके ठीक बाद आत्महत्याओं की संख्या में तेजी देखी गई. साल की शुरुआत में सूखे जैसी स्थिति और फिर बेमौसम भारी बारिश ने फसलों को बर्बाद कर दिया. साहूकारों और बैंकों के बढ़ते कर्ज के बोझ ने किसानों को मानसिक रूप से तोड़ दिया.
कपास और सोयाबीन जैसी नकदी फसलों के दाम बाजार में लागत से भी कम रहे जबकि खेती का खर्च बहुत अधिक आया. 'दिलासा संस्था' और 'एसबीआई फाउंडेशन' के जरिये सिर्फ एक एकड़ खेत की मशागत (जुताई) करने में सिर्फ दो सौ रुपये लगते हैं. इसलिए किसानों को भारी फायदा हो रहा है. जानकारों का कहना है कि इस तरह के सामाजिक प्रयास से किसान आत्महत्या की ओर नहीं बढ़ेंगे क्योंकि उनकी खेती में लागत घटेगी और आय में वृद्धि होगी.
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