
कॉटन पिकिंग मशीनमहाराष्ट्र के अकोला जिले में कपास उत्पादन को नई दिशा देने वाले प्रगतिशील किसान दिलीप ठाकरे ने एक साथ दो बड़ी चुनौतियों-घटती उत्पादकता और बढ़ते मजदूर संकट-पर प्रभावी समाधान पेश किया है. एक ओर उन्होंने सघन पद्धति से कपास बुवाई कर प्रति एकड़ 15 से 18 क्विंटल तक उत्पादन का मॉडल तैयार किया है, तो दूसरी ओर आधुनिक कॉटन पिकिंग मशीन को अपने खेत में उतार कर कपास तुड़ाई में मजदूरों की भारी कमी की समस्या से किसानों को राहत का रास्ता दिखाया है.
दिलीप ठाकरे के खेत पर हाल ही में इस नई कपास चुनने वाली मशीन का प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया गया, जिसे देखने अकोला सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में किसान पहुंचे. यह मशीन करीब 45 मिनट में एक-एक कतार का कपास चुनती है और एक दिन में 12 से 15 एकड़ तक कपास की तुड़ाई करने में सक्षम है.
मौजूदा समय में कपास तुड़ाई के लिए मजदूरों की भारी किल्लत और बढ़ती मजदूरी दरों से किसान परेशान हैं. ऐसे में यह मशीन आने वाले दिनों में और गहराने वाले मजदूर संकट से निपटने का एक ठोस विकल्प बनकर सामने आई है.
दिलीप ठाकरे ने बताया कि आधुनिक तंत्रज्ञान और यांत्रिकीकरण के बिना अब खेती को टिकाऊ बनाना मुश्किल हो गया है. उन्होंने किसानों से अपील की कि वे केवल परंपरागत तरीकों पर निर्भर न रहते हुए नई तकनीकों को अपनाएं, ताकि लागत घटे और समय पर तुड़ाई संभव हो सके.
इसी के साथ अकोला में आकार ले रहा ‘अकोला पैटर्न’ अब देशभर में कपास नीति की आधारशिला बनने की ओर बढ़ रहा है. इस सघन कपास लागवड पद्धति के तहत पारंपरिक तरीके से एक एकड़ में लगाए जाने वाले 6 से 7 हजार पौधों के बजाय 29 से 40 हजार पौधे 20×20 सेंटीमीटर के अंतर पर लगाए जाते हैं. सही किस्मों के चयन और वैज्ञानिक प्रबंधन से इस पद्धति में प्रति एकड़ 15 से 18 क्विंटल तक उत्पादन संभव हो रहा है.
देश में सबसे अधिक कपास उत्पादन के बावजूद उत्पादकता में पिछड़े भारत के लिए यह मॉडल बेहद अहम माना जा रहा है. दिलीप ठाकरे के मार्गदर्शन में पंजाब से लेकर तेलंगाना तक नौ राज्यों में किसान इस सघन पद्धति को अपना रहे हैं. इसी काम के चलते उन्हें केंद्र सरकार के वस्त्रोद्योग मंत्रालय की समिति में भी स्थान मिला है.
पिछले साल कोयंबटूर में आयोजित भारतीय कपास परिषद में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2030 तक देशभर में 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर ‘अकोला पैटर्न’ से कपास की खेती करने की घोषणा की है. इस वर्ष अकोला जिले में लगभग 3 हजार हेक्टेयर क्षेत्र पर यह प्रयोग चल रहा है, जबकि अगले मौसम में इसे 50 हजार हेक्टेयर तक विस्तार देने की तैयारी है.

डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ, अकोला भी इस मॉडल को वैज्ञानिक आधार पर आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है. विश्वविद्यालय स्तर पर प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और बीज उत्पादन पर विशेष जोर दिया जा रहा है.
दिलीप ठाकरे का मानना है कि कपास की खेती में अब सिर्फ अधिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सही तकनीक, सघन बुवाई और यंत्रीकरण ही भविष्य है. सघन पद्धति से उत्पादन बढ़ाकर और कॉटन पिकिंग मशीन से मजदूरों पर निर्भरता घटाकर अकोला के किसान न केवल अपनी लागत कम कर सकते हैं, बल्कि समय पर तुड़ाई कर बेहतर गुणवत्ता और अधिक आमदनी भी हासिल कर सकते हैं.
कुल मिलाकर, अकोला का यह नया प्रयोग — सघन बुवाई और आधुनिक तुड़ाई मशीन — मजदूर संकट से जूझ रहे कपास उत्पादक किसानों के लिए एक नई राह और देश के कपास भविष्य के लिए एक मजबूत ‘अकोला पैटर्न’ बनता जा रहा है.
इस मशीन द्वारा कॉटन की टीचिंग करना यह मजदूर न मिलने की समस्या का समाधान जरूर है लेकिन इसमें चुनौतियां भी काम नहीं हैं. कपास चुनने के बाद उसमें आने वाला कचरा भी कम होता है जबकि मैन्युअल या मजदूरों से चुने गए कपास में कचरा अधिक होता है. लेकिन यह मशीन कई समस्याओं का हल एक साथ दे देती है.
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