Agri Innovation: खेती में नई उम्मीद बनी ‘रूटोनिक’ तकनीक, कम लागत में ज्यादा उत्पादन का दावा

Agri Innovation: खेती में नई उम्मीद बनी ‘रूटोनिक’ तकनीक, कम लागत में ज्यादा उत्पादन का दावा

नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी की विकसित ‘रूटोनिक’ तकनीक खेती में नई उम्मीद बनकर सामने आई है. जैविक फंगस आधारित यह तकनीक फसलों की जड़ों को मजबूत बनाने, उत्पादन बढ़ाने और मौसम व बीमारियों के असर को कम करने का दावा करती है. वैज्ञानिकों के अनुसार इससे खेती की लागत भी घट सकती है.

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खेती में नई उम्मीद बनी ‘रूटोनिक’ तकनीक, कम लागत में ज्यादा उत्पादन का दावातकनीक की जानकारी देते हुए वैज्ञानिक

खेती की बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की घटती गुणवत्ता के बीच वैज्ञानिक तकनीकों को खेती से जोड़ने की कोशिशें तेज हो रही हैं. इसी दिशा में नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी की विकसित तकनीक ‘रूटोनिक’ चर्चा में है. इस तकनीक काे विकसित करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि यह फसलों की पैदावार बढ़ाने के साथ पौधों को मौसम और बीमारियों के प्रभाव से बचाने में भी मदद कर सकती है. साथ ही इससे खेती को ज्यादा टिकाऊ और कम लागत वाला बनाने की संभावना भी जताई जा रही है.

जड़ों के साथ काम करती है तकनीक

एमिटी यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी के निदेशक डॉ. अमित सी. खर्कवाल ने बताया कि ‘रूटोनिक’ एक विशेष जैविक फंगस आधारित तकनीक है, जिसे पौधों की जड़ों के साथ काम करने के लिए विकसित किया गया है. उन्‍होंने कहा कि यह तकनीक पौधों की जड़ों की क्षमता बढ़ाने और उन्हें जैविक और पर्यावरणीय दबावों से लड़ने में मदद करती है. इससे पौधों की वृद्धि बेहतर होने और उत्पादन क्षमता में सुधार की संभावना बनती है.

ट्रायल में मिले बेहतर परिणाम

डॉ. अमित सी. खर्कवाल ने बताया कि इस तकनीक के ग्रीनहाउस और फील्ड ट्रायल देश के अलग-अलग राज्यों में किए गए हैं. हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और लद्दाख जैसे अलग-अलग जलवायु वाले क्षेत्रों में परीक्षण किए गए. इन परीक्षणों में फसलों के उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार के संकेत मिले हैं. 

तकनीक को किसानों तक पहुंचाने के लिए उद्योग जगत के साथ तकनीक ट्रांसफर की प्रक्रिया भी शुरू की गई है. दावा है कि इसके उपयोग से किसान 25 से 40 फीसदी तक अधिक उत्पादन हासिल कर सकते हैं.

कम लागत और टिकाऊ खेती पर जोर

डॉ. अमित सी. खर्कवाल ने कहा कि इस तकनीक की लागत भी सीमित रखी गई है. उन्होंने बताया कि एक एकड़ फसल में इसके इस्तेमाल पर करीब 1000 से 1500 रुपये तक खर्च आने का अनुमान है. वहीं आलू, टमाटर और अन्य सब्जियों में इसकी लागत इससे भी कम हो सकती है, क्योंकि इसमें कम मात्रा की जरूरत होती है. 

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ऐसी तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाया जाता है तो रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने, मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है. (मनीष चौरसिया की रिपोर्ट)

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