कम दूरी की जगह 4.5 फीट का गैप, गन्ने की पैदावार 72% बढ़ाकर मिसाल बने किसान

कम दूरी की जगह 4.5 फीट का गैप, गन्ने की पैदावार 72% बढ़ाकर मिसाल बने किसान

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के किसान नारायण सिंह पटेल ने गन्ने की खेती में पारंपरिक कम दूरी वाली बुवाई की जगह 4.5 फीट की दूरी अपनाकर उत्पादन में बड़ा बदलाव किया है. इस संशोधित स्पेसिंग तकनीक से गन्ने की पैदावार 72% तक बढ़कर 950 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पहुंच गई, जबकि बीज और उत्पादन लागत में 25-30% की कमी आई. उनकी यह तकनीक अब जिले के करीब 12 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में अपनाई जा रही है.

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कम दूरी की जगह 4.5 फीट का गैप, गन्ने की पैदावार 72% बढ़ाकर मिसाल बने किसाननई तकनीक से किसान ने की गन्ने की खेती, अच्छी मिली पैदावार

गन्ना देश की एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है, जिसकी खेती उप-उष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय दोनों क्षेत्रों में लगभग 50 लाख हेक्टेयर (5 मिलियन हेक्टेयर) जमीन पर की जाती है. उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में गन्ने की खेती का 55% से ज्यादा हिस्सा है, लेकिन उष्णकटिबंधीय भारत की तुलना में यहां गन्ने की पैदावार और चीनी की रिकवरी कम है.

नारायण सिंह पटेल 'भारत' मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करकबेल गांव के एक मेहनती और इनोवेटिव युवा किसान हैं. उनके पास 10 हेक्टेयर जमीन है और गन्ना उनकी मुख्य फसल है. कम पैदावार के कारण उन्हें गन्ने की खेती से ज्यादा फायदा नहीं हो रहा था. अपनी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान खोजने के लिए पटेल ने जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय (JNKVV), जबलपुर और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), नरसिंहपुर के साथ गन्ने की बुवाई में पौधों के बीच कम दूरी (close spacing) की समस्या पर चर्चा की. JNKVV और KVK के वैज्ञानिकों ने गन्ने की पैदावार बढ़ाने के लिए कुछ नए और बेहतर तरीके सुझाए. उन्होंने गन्ने की खेती में पौधों के बीच की दूरी में बदलाव (modified spacing) किया, जिसके नतीजे बहुत अच्छे मिले.

नई तकनीक से मिली अधिक पैदावार

ज्यादा पैदावार पाने का उनका सफर नए तरीके को अपनाने तक ही सीमित नहीं रहा. उन्होंने विश्वविद्यालय की 60-90 सेमी की दूरी वाली सलाह में भी बदलाव किया. उन्होंने खरपतवार हटाने और खेती से जुड़े अन्य कामों को आसान बनाने के लिए गन्ने की फसल में 135 सेमी (4.5 फ़ीट) की दूरी अपनाई. उन्होंने खुद से बनाए गए ट्रैक्टर-संचालित वीडर (खरपतवार हटाने वाली मशीन) का इस्तेमाल किया. इससे उत्पादन लागत, समय और अन्य खर्चों में काफ़ी कमी आई.

गन्ने की बुवाई के लिए ज्यादा दूरी (4.5 फ़ीट) रखने की इस नई तकनीक को विकसित और परखा गया, किसानों ने इसे अपनाया और जिले में लगभग 40% क्षेत्र (12,000 हेक्टेयर) में इसे लागू किया गया. गन्ने की बुवाई का यह तरीका न केवल उत्पादन लागत को 25-30% (15,000 से 20,000 रुपये प्रति हेक्टेयर) तक कम करता है - क्योंकि इसमें 50% कम बीज की जरूरत होती है (यानी 125 क्विंटल/हेक्टेयर के बजाय 62 क्विंटल/हेक्टेयर) - बल्कि पारंपरिक तरीके (2-2.5 फ़ीट की दूरी पर 400-550 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन) की तुलना में पैदावार को 72% (950 क्विंटल/हेक्टेयर) तक बढ़ाता भी है.

इनोवेटिव आइडिया से बनाई खास मशीन

पटेल ने पौधों के ऊपरी हिस्से या मिट्टी की सतह पर हाथ से खाद डालने के बजाय, जड़ों के पास सही जगह पर खाद पहुंचाने के लिए 'टू-टाइन फर्टिलाइजर ड्रिल' तैयार की. इस तरह, कम बीज दर, ट्रैक्टर से चलने वाले वीडर, खुद विकसित की गई टू-टाइन फर्टिलाइजर ड्रिल और ट्रैक्टर से चलने वाली बुवाई मशीन के इस्तेमाल से खेती की लागत 25-30% तक कम हो गई.

उन्होंने नरसिंहपुर जिले में पौधों के बीच सही दूरी रखने की इस नई तकनीक का प्रचार-प्रसार करने के लिए एक 'कृषक क्लब' भी बनाया. उन्होंने किसानों को गन्ने की नई तकनीक के बारे में जानकारी देने के लिए 100 सीडी (CDs) भी उपलब्ध कराईं. अब पटेल अपने इलाके के एक प्रगतिशील किसान हैं और बेहतर तकनीक अपनाकर गन्ने के उत्पादन से बहुत संतुष्ट हैं.

मध्य प्रदेश में गन्ने की खेती मुख्य रूप से नरसिंहपुर जिले में होती है, जहां राज्य के कुल गन्ना क्षेत्र का लगभग 65% हिस्सा है. यहां मुख्य रूप से काली मिट्टी में बड़े पैमाने पर स्प्रिंकलर सिंचाई का इस्तेमाल करके खेती की जाती है और किसान प्रति हेक्टेयर औसतन 608 क्विंटल उपज पाते हैं. इस इलाके में अब किसान सीधे मिलों को कच्चा गन्ना बेचने के बजाय ज्यादा मुनाफा देने वाले गुड़ बनाने और ऑटोमेटेड खांडसारी उत्पादन पर अधिक ध्यान दे रहे हैं.

गन्ना उत्पादन में यह जिला अव्वल

गन्ना उत्पादन के मुख्य केंद्र में नरसिंहपुर जिला (जिसे अक्सर "मध्य प्रदेश का शुगर बाउल" कहा जाता है) आता है. इस जिले में लगभग 75,000 हेक्टेयर में खेती होती है और औसत उपज ~608.68 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस जिले में लगभग 3,000 गुड़ प्रोसेसिंग यूनिट और ऑटोमेटेड खांडसारी प्लांट हैं, क्योंकि स्थानीय स्तर पर वैल्यू एडिशन (मूल्य संवर्धन) से चीनी मिलों पर निर्भर रहने की तुलना में बेहतर मुनाफा मिलता है. 

गन्ना गहरी काली मिट्टी में अच्छी तरह उगता है. चूंकि इस मिट्टी में क्ले (चिकनी मिट्टी) की मात्रा और पानी सोखने की क्षमता ज्यादा होती है, इसलिए 80% से अधिक इलाके में स्प्रिंकलर सिंचाई का इस्तेमाल किया जाता है.

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