सरकार से समय पर ढैंचा के प्रमाणित बीज देने की मांगदशकों से यूरिया के अंधाधुंध इस्तेमाल ने हमारी उपजाऊ जमीन को बीमार कर दिया है. गंगा के मैदानी इलाकों में मिट्टी का आर्गेनिक कार्बन 0.5 फीसदी से घटकर मात्र 0.2 फीसदी रह गया है, जो बेहद चिंताजनक है. आर्गेनिक कार्बन की कमी से पौधों का विकास रुक जाता है और बीमारियां बढ़ जाती हैं. इस चक्र को तोड़ने का सबसे सटीक और प्राकृतिक तरीका है 'ढैंचा' की हरी खाद खेत में ढैंचा उगाकर उसे वहीं जोत देने से महज 8-10 दिनों में जमीन को भरपूर पोषण मिल जाता है.
एक हेक्टेयर में करीब 90-120 किलो नाइट्रोजन और जरूरी फास्फोरस और पोटाश कुदरती रूप से मिल जाते हैं. यह न केवल मिट्टी को भुरभुरा और उपजाऊ बनाता है, बल्कि यूरिया पर किसानों की निर्भरता और सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी कम करता है. बिना अतिरिक्त सिंचाई के तैयार होने वाली यह फसल बंजर होती जमीन के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है. बिहार, हरियाणा राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारें ढैंचा बीज पर 50 से लेकर 90 फीसदी तक की भारी सब्सिडी देती है.
उत्तर प्रदेश के किसानों के सामने एक अलग ही संकट है. रायबरेली के 'महात्मने फार्मर स्पाइसेस प्रोड्यूसर कंपनी' के किसान केशवानंद त्रिपाठी और बलिया के ग्राम प्रधान विनोद चौहान का कहना है कि विभाग पिछले कई सालों से 50 फीसदी की सब्सिडी पर ढैंचा का बीज तब मिलता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है.
धान की रोपाई जून के अंत या जुलाई में शुरू हो जाती है, जबकि ढैंचा का बीज मई के अंत या जून में मिलता है. ढैंचा को खाद के रूप में तैयार होने के लिए कम से कम 50 से 60 दिन का समय चाहिए. अगर बीज ही जून में मिलेगा तो किसान उसे बड़ा करके खेत में कब पलटेगा?
देरी से बीज मिलने के कारण किसान इसका लाभ नहीं उठा पाते और मजबूरी में उन्हें फिर से भारी मात्रा में यूरिया का सहारा लेना पड़ता है. इससे सरकार की योजना का उद्देश्य भी पूरा नहीं होता और सरकारी बीज का पैसा भी बर्बाद चला जाता है.
अजय कुमार सिंह, प्रांत महामंत्री, भारतीय किसान सघ गोरक्ष प्रांत- उत्तर प्रदेश ने कहा कि ढैंचा के बीज देरी से उपलब्ध होते हैं. साथ ही दूसरी सबसे बड़ी समस्या 'बीज की गुणवत्ता' और 'सर्टिफिकेशन' की है. किसानों की शिकायत है कि कृषि विभाग द्वारा जो ढैंचा बीज दिया जाता है, वह अक्सर 'सर्टिफाइड' नहीं होता. प्रमाणित बीज होने की वजह से कई बार बीज खेतों में जमता ही नहीं है.
उनका कहना है कि एक तरफ तो सरकार नकली बीजों पर कड़े कानून लाने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ विभाग खुद ढैंचा बीज देरी के साथ और वो भी बिना सर्टिफाइड बीज उपलब्ध करा रहा है. अगर बीज खराब निकलता है या जमाव नहीं होता, तो किसान कहीं इसकी आधिकारिक शिकायत भी नहीं कर पाता. इससे किसान की मेहनत, पैसा और समय तीनों बर्बाद होते हैं. किसानों की साफ मांग है किसानों को समय पर और प्रमाणित बीज ही दिया जाए, ताकि फसल की गारंटी रहे और मिट्टी को वाकई पोषण मिल सके.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के प्रगतिशील और पदमश्री से सम्मानित किसान सेठपाल सिंह और कृषि विशेषज्ञों का साझा सुझाव है कि अगर सरकार वास्तव में यूरिया का इस्तेमाल कम करना चाहती है और मिट्टी बचाना चाहती है तो ढैंचा बीज वितरण की पूरी नीति बदलनी होगी.
धान की खेती करने वाले किसानों के लिए ढैंचा बीज हर हाल में 15 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच उपलब्ध हो जाना चाहिए. अगर किसान 15 मई तक बुवाई कर देता है तो जून के अंतिम सप्ताह में धान की रोपाई से पहले ढैंचा की भरपूर पत्तियां तैयार हो जाएंगी, जिन्हें खेत में पलटकर हरी खाद का पूरा लाभ लिया जा सकता है.
सरकार को चाहिए कि वह बीज वितरण की प्रक्रिया को समय से पहले दुरुस्त करे और यह सुनिश्चित करे कि बीज उच्च गुणवत्ता वाला और सर्टिफाइड हो. जब तक समय पर और सही बीज नहीं मिलेगा, तब तक "मिट्टी बचाओ" और "यूरिया घटाओ" के नारे जमीन पर हकीकत नहीं बन पाएंगे.
बीज की गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर सरकारी विभागों के दावों में भी काफी अंतर देखने को मिल रहा है. गाजीपुर के कृषि विभाग के डीडीओ विनय कुमार ने बीज की कमी पर चिंता जताते हुए कहा कि किसानों के बीच ढैंचा बीज की मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन विभाग केवल 10 से 15 फीसदी बीज ही उपलब्ध करा पा रहा है.
उन्होंने यह भी साफ किया कि विभाग जो बीज मुहैया कराता है, वह पूरी तरह 'सर्टिफाइड' नहीं बल्कि कंपनियों द्वारा तैयार 'ट्रुथफुल'+बीज होता है. कानपुर नगर के ब्लॉक टेक्निकल मैनेजर धीरज पाल सिंह का कहना है कि विभाग द्वारा किसानों को दिया जाने वाला ढैंचा का बीज 'प्रमाणित' नहीं, बल्कि 'ट्रुथफुल' होता है, जिसे 50 फीसदी सब्सिडी पर बांटा जाता है.
ट्रुथफुल बीज का मतलब है कि इसकी शुद्धता की जिम्मेदारी केवल बीज तैयार करने वाली संस्था पर होती है, सरकारी लैब की वैसी गारंटी नहीं होती जैसी प्रमाणित बीज में मिलती है. दूसरी ओर, भदोही के उप-कृषि निदेशक ए.के. सिंह का कहना है कि ढैंचा का बीज अप्रैल और मई के महीने में ही विभाग के पास आ जाता है और किसानों को समय पर बांट दिया जाता है.
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