खरीफ प्याज से बदलेगी बुंदेलखंड की तस्वीर, इन 10 उन्नत किस्मों से 40 टन/हेक्टेयर मिलेगी पैदावार

खरीफ प्याज से बदलेगी बुंदेलखंड की तस्वीर, इन 10 उन्नत किस्मों से 40 टन/हेक्टेयर मिलेगी पैदावार

बुंदेलखंड के किसानों की किस्मत बदलने के लिए बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में इन दिनों खरीफ प्याज को लेकर शोध कार्य जारी है. 10 उन्नत किस्मों पर काम लगभग पूरा है जिससे बुंदेलखंड के प्याज किसानों को बहुत लाभ मिलेगा.

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खरीफ प्याज से बदलेगी बुंदेलखंड की तस्वीर, इन 10 उन्नत किस्मों से 40 टन/हेक्टेयर मिलेगी पैदावारबांदा कृषि विश्वविद्यालय की उन्नत प्याज किस्में

बुंदेलखंड के किसानों की आमदनी बढ़ाने और खरीफ सीजन में खाली पड़ी जमीन के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में खरीफ प्याज की उन्नत खेती और भंडारण तकनीक पर व्यापक शोध कार्य चल रहा है. विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी विभाग के सहायक प्राध्यापक अमित कुमार सिंह के नेतृत्व में 10 अलग-अलग प्रजातियों का परीक्षण किया जा रहा है, ताकि क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुरूप सबसे उपयुक्त किस्मों का चयन किया जा सके.

10 उन्नत प्रजातियों पर परीक्षण

विश्वविद्यालय में जिन प्रमुख प्रजातियों पर शोध हो रहा है, उनमें लाइन 883, भीमा रेड, भीमा सफेद, भीम शक्ति और भीमा किरण सहित कुल 10 वैरायटी शामिल हैं.

ये किस्में देश के दो प्रमुख संस्थानों द्वारा विकसित की गई हैं—डायरेक्टोरेट ऑफ अनियन एंड गार्लिक रिसर्च और नेशनल हॉर्टिकल्चर डेवलपमेंट फाउंडेशन.

इन सभी प्रजातियों का परीक्षण बुंदेलखंड की कम नमी वाली मिट्टी और अनियमित वर्षा की परिस्थितियों में किया जा रहा है. प्रारंभिक नतीजे उत्साहजनक बताए जा रहे हैं.

बुंदेलखंड के लिए क्यों है खास?

बुंदेलखंड के किसान अब तक मुख्य रूप से दलहन, तिलहन और मिलेट्स पर निर्भर रहे हैं. खरीफ सीजन में कई बार भूमि खाली रह जाती है.

नई खरीफ प्याज किस्में कम पानी में बेहतर उत्पादन देती हैं, सीमित उर्वरक पर भी अच्छा प्रदर्शन करती हैं, सूखे की स्थिति में भी स्थिर उत्पादन देती हैं. इससे न केवल खाली भूमि का उपयोग बढ़ेगा, बल्कि किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिलेगा.

शोध की प्रमुख विशेषताएं

1- कम अवधि में परिपक्वता

जहां पारंपरिक प्याज 120–150 दिन में तैयार होती है, वहीं नई किस्में 90–100 दिनों में फसल देने योग्य हो जाती हैं.

2-उच्च उत्पादन क्षमता

  • 300–350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार संभव.
  • वैज्ञानिक पैकेज अपनाने पर 40 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन.
  • “लाइन 883” डार्क रेड श्रेणी की किस्म है, जो सूखे में भी बेहतर प्रदर्शन करती है.

3- कम बीज दर

केवल 3 किलोग्राम बीज प्रति बीघा से उच्च उत्पादन संभव.

खरीफ प्याज की सबसे बड़ी चुनौती भंडारण है. खरीफ सीजन में उत्पादन कम होने के बावजूद भंडारण बड़ी समस्या है. ठंड के समय कटाई के बाद अधिक आर्द्रता के कारण अंकुरण (स्प्राउटिंग), ब्लैक स्मट जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं.

समाधान क्या है?

  • बेहतर क्यूरिंग (Curing) तकनीक
  • नियंत्रित तापमान पर सुखाना
  • मजबूत बाहरी परत विकसित करना
  • उचित एयर सर्कुलेशन वाली स्टोरेज संरचना

विश्वविद्यालय की टीम इन तकनीकों पर भी काम कर रही है।

नर्सरी प्रबंधन पर विशेष जोर

खरीफ प्याज की सफलता सही नर्सरी प्रबंधन पर निर्भर करती है. नर्सरी जुलाई–सितंबर के बीच डाली जा सकती है. किसानों को सलाह है कि वे लगातार बारिश में ऊंचे बेड पर नर्सरी तैयार करें. स्थायी शेड संरचना का उपयोग करें. बारिश खत्म होने के बाद पौधों को खुला वातावरण दें.

उर्वरक और सिंचाई प्रबंधन

  • ट्रांसप्लांटिंग के बाद 2–3 बार निराई-गुड़ाई
  • हर 10–15 दिन में सिंचाई (मिट्टी की नमी के अनुसार)
  • संतुलित उर्वरक प्रबंधन आवश्यक

प्याज सल्फर यौगिकों का प्रमुख स्रोत है, इसलिए नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के साथ सल्फर का प्रयोग अनिवार्य है. कंद बनने की अवस्था में सल्फर देने से तीक्ष्णता (पंजेंसी) बढ़ती है.

किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम

बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का यह शोध बुंदेलखंड क्षेत्र में खरीफ सीजन को लाभकारी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है. यदि किसान वैज्ञानिक सिफारिशों को अपनाते हैं, तो प्याज उत्पादन से उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है. खरीफ प्याज अब बुंदेलखंड के लिए सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि संभावनाओं का नया द्वार बनकर उभर रही है.

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