आम के दुश्मन कीटों से बचाव जरूरीभारत में बागवानी के तहत सबसे बड़ा इलाका आम का ही है. अगर आप इस साल आम की बंपर पैदावार चाहते हैं, तो फरवरी का महीना आपके लिए सबसे ज्यादा अहम है क्योंकि तापमान बढ़ते ही मंजर से फल बनने का सफर शुरू हो जाता है. इसलिए इसकी सही देखभाल बेहद जरूरी है. दिसंबर से लेकर मध्य जनवरी तक का समय पेड़ों के लिए 'डोरमेंसी' यानी आराम का वक्त होता है. लेकिन जैसे ही जनवरी का दूसरा हफ्ता बीतता है, पेड़ों पर नई कोपलों के साथ बौर यानी मंजर आने का सिलसिला शुरू हो जाता है. यही वह नाजुक समय है जब खाद, सही सिंचाई और कीटों से सुरक्षा बाग की किस्मत तय करती है.
लखनऊ के केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (CISH) के विशेषज्ञों के मुताबिक, अगेती बौर पर झुलसा रोग का खतरा सबसे ज्यादा रहता है. खासकर जब हवा में नमी 80 प्रतिशत से ऊपर हो या अचानक बेमौसम बारिश हो जाए, तो फफूंदी सक्रिय हो जाती है और फूल झड़ने लगते हैं. इससे बचाव के लिए 2 ग्राम मैंकोजेब और कार्बेन्डाजिम के मिश्रण को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ताकि फसल को शुरुआती नुकसान से बचाया जा सके.
आम के बागों में 'गुझिया' एक ऐसा दुश्मन है जो चुपके से जमीन से चढ़कर पूरी फसल तबाह कर सकता है. इसे रोकने का सबसे असरदार और सस्ता तरीका 'ट्री-बैंडिंग' है. इसके लिए आपको बस 1 किलो चिकनी मिट्टी, 250 ग्राम पी.ओ.पी. और थोड़ा जला हुआ मोबिल ऑयल चाहिए. इन सबको मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट बनाएं और पेड़ के तने पर जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर चारों तरफ 2-3 इंच चौड़ी पट्टी बना दें. इस पट्टी के ऊपर प्लास्टिक की शीट या सेलो टेप को मजबूती से लपेटकर सुतली से बांध दें. यह चिकनी सतह कीटों को ऊपर चढ़ने से रोक देती है.
इसके साथ ही, 'इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट' (IPM) अपनाते हुए पेड़ के चारों तरफ एक मीटर के घेरे में नीम या करंज की खली जरूर डालें. यह मिट्टी में छिपे कीटों को वहीं खत्म कर देती है. यदि कीट गलती से ऊपर पहुंच जाएं, तो डायमेथोएट का छिड़काव करना अनिवार्य हो जाता है ताकि बौर सुरक्षित रहें.
मधुआ यानी मैंगो हॉपर आम के ऐसे घातक दुश्मन हैं जो टहनियों और मंजरों का रस चूसकर उन्हें सुखा देते हैं. मधुआ कीट पूरे भारत में, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के इलाकों में तबाही मचाता है. जब पूर्वी हवा (पुरवा) चलती है और मौसम में नमी बढ़ती है, तो इनका हमला इतना तेज होता है कि देखते ही देखते 50 से 90 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो सकती है. ये कीट एक मीठा और चिपचिपा पदार्थ छोड़ते हैं, जिसे 'सूटी मोल्ड' या काली फफूंद कहा जाता है. यह फफूंद पत्तियों को काला कर देती है, जिससे पेड़ धूप से अपना भोजन नहीं बना पाते और कमजोर होकर सूखने लगते हैं. सही समय पर निगरानी और बचाव ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है, अन्यथा फल बनने से पहले ही गिर जाते हैं.
अगर आपके बाग में कीटों का हमला ज्यादा दिख रहा है और मंजर आने में देरी हो रही है, तो विशेषज्ञों द्वारा 'पेड़ों की धुलाई' की सलाह दी जाती है. इसके लिए किसी असरदार कीटनाशक की 2 मिलीलीटर मात्रा को एक लीटर पानी में घोलें और स्प्रे मशीन से तने से लेकर पत्तियों तक पूरे पेड़ को अच्छी तरह नहला दें.
यह तरीका छिपे हुए कीटों को जड़ से खत्म कर देता है. जब मंजर निकल रहे हों लेकिन फूल अभी खिले न हों, तो सावधानी और भी बढ़ानी पड़ती है. इस दौरान सिस्टेमिक इंसेक्टिसाइड 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के साथ 'स्टीकर' चिपकाने वाला गोंद का प्रयोग जरूर करें.
स्टीकर मिलाने से दवा ओस या हल्की फुहार में भी पत्तियों और फूलों पर लंबे समय तक टिकी रहती है, जिससे कीटों पर दवा का असर गहरा होता है और आपकी मेहनत सफल होती है.
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