
मुजफ्फरपुर के आम बागवानी किसान विकास यादवबिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखंड के रक्सा गांव के रहने वाले विकास कुमार यादव ने साबित कर दिया है कि अगर जुनून और मेहनत हो तो खेती भी लाखों की नौकरी से बेहतर पहचान दिला सकती है. ऐसे ही एक शख्स हैं विकास यादव जो कभी 8.5 लाख रुपये सालाना पैकेज पर नौकरी करते थे. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और आम की बागवानी में लग गए. विकास आज ‘मैंगो मैन’ के नाम से जाने जाते हैं. उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर आम की नर्सरी और बागवानी को अपना करियर बनाया और आज उनके बगीचे में 92 प्रकार के आमों की वैरायटी मौजूद हैं.
विकास कुमार यादव किसान परिवार से आते हैं. बचपन से ही उन्हें पौधों और खेती से लगाव था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कृषि विकास से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स में काम किया और करीब पांच वर्षों तक अलग-अलग संस्थाओं के साथ जुड़े रहे.
इस दौरान उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में किसानों के बीच काम किया. UNICEF और Tata Trusts जैसी संस्थाओं के साथ भी उन्होंने कृषि विकास के क्षेत्र में योगदान दिया. नौकरी के दौरान विकास ने महसूस किया कि किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौधे और सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता.
इसी समस्या का समाधान करने के लिए उन्होंने वर्ष 2014 से अलग-अलग किस्मों के आमों पर प्रयोग शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने देश और विदेश से दुर्लभ वैरायटी के पौधे जुटाए और अपने बगीचे में उनका परीक्षण किया.

वर्ष 2023 में उन्होंने बड़ा फैसला लेते हुए 8.5 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह खेती और नर्सरी व्यवसाय में उतर गए. आज उनके बगीचे में जापान, ऑस्ट्रेलिया, थाइलैंड, पाकिस्तान समेत कई देशों की दुर्लभ आम की किस्में मौजूद हैं. इनमें मियाजाकी, केन्सिंग्टन प्राइड, अनवर रटोल, अटाउल्फो, आर2ई2, अल्फांसो, कैरी, फेयरचाइल्ड, नाओमी, येलो डायमंड, गोल्डन क्वीन और रेड एम्परर जैसी चर्चित वैरायटी शामिल हैं.
उनके बगीचे की सबसे बड़ी खासियत ग्राफ्टिंग तकनीक है. विकास ने कई ऐसे प्रयोग किए हैं जिनमें एक ही पौधे पर अलग-अलग किस्मों के आम फलते हैं. उनका दावा है कि उनके पास एक ऐसा पेड़ भी है, जिसके फल में तीन अलग-अलग स्वाद महसूस होते हैं. यही वजह है कि उनका बगीचा किसानों और कृषि विशेषज्ञों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है.
विकास केवल आम की खेती ही नहीं कर रहे, बल्कि सफल नर्सरी व्यवसाय भी चला रहे हैं. उनके यहां से बिहार समेत देश के कई राज्यों में पौधे भेजे जाते हैं. पड़ोसी देश नेपाल से भी किसान उनके बगीचे में पहुंचकर पौधों की खरीदारी करते हैं.
विकास बताते हैं कि सभी खर्च निकालने के बाद उन्हें हर महीने 30 से 40 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है, जबकि आम के सीजन में यह कमाई और बढ़ जाती है. उनका कहना है कि खेती में अपार संभावनाएं हैं, जरूरत सिर्फ नई सोच और आधुनिक तकनीक अपनाने की है.
आज रक्सा गांव का यह बगीचा कृषि नवाचार का एक मॉडल बन चुका है. बड़ी संख्या में किसान यहां पहुंचकर ग्राफ्टिंग, दुर्लभ किस्मों की खेती और नर्सरी प्रबंधन की जानकारी लेते हैं. विकास कुमार यादव की सफलता की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो खेती को आधुनिक और लाभकारी व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं.
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