सोयाबीन की बुवाई ने पकड़ी रफ्तार सोयाबीन की बुवाई में महाराष्ट्र इस साल पिछले वर्ष के मुकाबले आगे है. साल 2022 के मुकाबले इस बार 0.32 लाख हेक्टेयर अधिक रकबा हो चुका है. सोयाबीन उत्पादन में महाराष्ट्र ने मध्य प्रदेश को पछाड़कर नंबर वन होने का तमगा हासिल कर लिया है. इस साल यहां किसानों ने बड़े पैमाने पर इसकी खेती की है. खानदेश एरिया में सोयाबीन की बुवाई इस साल स्थिर है. करीब 38 हजार हेक्टेयर में कवरेज पूरा हो चुका है. जबकि जलगांव जिले में करीब 28 हजार हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी है. इन दोनों क्षेत्रों में बुआई की अंतिम सूचना अभी जारी नहीं हुई है. लेकिन खबर है कि फाइनल रिपोर्ट जल्द ही जारी की जाएगी.
इस साल कई लोगों ने कपास की खेती कम कर दी है और सोयाबीन को प्राथमिकता दी है. क्योंकि कपास का दाम ठीक नहीं मिला. जलगांव जिले में सोयाबीन का संभावित क्षेत्रफल लगभग 28 हजार हेक्टेयर है. जिले में इतनी बुवाई हो चुकी है. क्योंकि 6 जुलाई के बाद कई इलाकों में संतोषजनक बारिश होने से बुवाई में तेजी आई है. बुवाई के बाद भी बारिश अच्छी हुई. इससे अंकुरण भी बेहतर हुआ है.
फिलहाल देश के सबसे बड़े सोयाबीन उत्पादन राज्य महाराष्ट्र में फसल अच्छी है. कई जगहों पर लोगों ने इंटरक्रॉपिंग भी की है. एक बार खाद भी दी जा चुकी है. कई लोग कीड़ों से बचाव के लिए छिड़काव भी कर रहे हैं. कुछ लोग खरपतवार नियंत्रण के लिए शाकनाशी का इस्तेमाल कर रहे हैं. कुछ सोयाबीन शाकनाशी की आपूर्ति भी कम है. कम कीमत वाली प्रभावी शाकनाशियों की कमी के कारण किसानों को अनावश्यक रूप से महंगी शाकनाशी का उपयोग करना पड़ रहा है. किसानों का कहना है कि इससे उत्पादन लागत कुछ बढ़ गई है.
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जहां पर अगेती बुवाई हुई है उन स्थानों पर फसलों में फूल आ रहे हैं. कुछ किसानों ने जल्दी उपज देने वाली या कम अवधि वाली सोयाबीन की किस्में लगाई हैं. कई लोगों ने बुवाई के लिए घरेलू बीजों का उपयोग किया है. धुले और नंदुरबार में भी सोयाबीन की बुवाई कम है. कुछ ही इलाकों में बुवाई हो पाई है. शिरपुर और कुछ हद तक धुले के शिंदखेड़ा तालुका में इसका काम पूरा हो चुका है. जबकि नंदुरबार के शहादा, तलोदा और नवापुर इलाके में कुछ किसान अभी सोयाबीन की बुवाई कर रहे हैं. इसके चलते इन दोनों जिलों में रकबा 10 हजार हेक्टेयर से ज्यादा नहीं है.
किसानों को इस साल भी अच्छे उत्पादन की उम्मीद है. जलगांव जिले में सोयाबीन की फसल जलगांव, चोपड़ा, यावल, अमलनेर, पचोरा, जामनेर आदि में उगाई जाती है. तापी के पास अधिक क्षेत्र है तथा काली कसदर क्षेत्र में फसल लहलहा रही है. कई लोग सोयाबीन की फसल लेते हैं और फिर उसमें चना बोते हैं. कहा जाता है कि भूमि की उर्वरता और अच्छी पैदावार के कारण भी सोयाबीन की ओर रुझान हुआ.
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