ईरान युद्ध से अंगूर के निर्यात पर असरअमेरिका-ईरान की लड़ाई बढ़ने से महाराष्ट्र से खाड़ी देशों को होने वाला अंगूर एक्सपोर्ट रुक गया है. इससे मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) में हजारों टन कृषि उत्पाद फंसे हैं और घरेलू मार्केट में सप्लाई की कमी की चिंता बढ़ गई है. दुबई के रास्ते गल्फ मार्केट में एक्सपोर्ट के लिए अंगूर के लगभग 300 कंटेनर—लगभग 3,900 टन—फंसे हुए हैं. इसके अलावा, अंगूर के लगभग 700 कंटेनर अभी पोर्ट और आस-पास के कोल्ड स्टोरेज में पड़े हैं. इससे महाराष्ट्र के किसानों की चिंता बढ़ गई है.
जुन्नर का नारंगा इलाका महाराष्ट्र में अंगूर का हब है. यहां से हजारों टन फल और सब्जियां दुनिया के कई देशों में एक्सपोर्ट होते हैं. हालिया घटनाक्रम के बारे में किसान प्रकाश वाघ कहते हैं, रमजान का महीना है, लेकिन अंगूर किसानों में मायूसी है. इस महीने अंगूर की सबसे अधिक सप्लाई पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के देशों में भेजी जाती है. मगर ईरान-अमेरिका की लड़ाई से सबकुछ ठप हो गया है. प्रकाश वाघ हर साल लगभग 50-60 क्विंटल अंगूर निर्यात करते हैं, लेकिन अभी तक 5-6 क्विंटल ही सप्लाई कर सके हैं. इस लड़ाई से उन्हें 50 लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता है.
प्रकाश वाघ ने बताया कि अंगूर 5-6 दिन तक खराब नहीं होता, लेकिन 15 दिन में सड़न शुरू हो जाती है. कोल्ड स्टोरेज में भी बहुत दिन तक नहीं रख सकते. जेएनपीटी और उसके आसपास के कई सेंटरों में अंगूर का स्टॉक भरा पड़ा है जो खराब होने की कगार पर है. एक्सपोर्ट करने के लिए कंटेनर वाले अधिक पैसे मांग रहे हैं. नुकसान की गारंटी भी नहीं ले रहे. इसका सबसे अधिक असर सांगली के किसानों पर पड़ा है. विदेशों में अंगूर नहीं जाने से किसानों ने इसकी कटिंग रोक दी है. जब निर्यात नहीं है तो अंगूर काटकर क्या होगा. सांगली में 2-3 हजार अंगूर किसान प्रभावित हैं. हालांकि कुछ किसानों के माल निकल गए हैं, मगर जिनके अंगूर अभी नहीं कटे हैं, वे बहुत परेशान हैं.
दो-चार दिन में अंगूर का एक्सपोर्ट नहीं खुला तो किसानों को मजबूरी में कोल्ड स्टोरेज से निकालकर लोकल मार्केट में बेचना पड़ेगा. इससे उन्हें दोहरा नुकसान होगा. एक्सपोर्ट में जहां 200 रुपये किलो तक बिक्री होती है, वहीं लोकल बाजार में कीमत 80 रुपये से ज्यादा नहीं मिलती. जबकि किसान की लागत इससे कहीं बहुत अधिक है. पिछले साल की बारिश ने अंगूर की बागवानी को चौपट किया था जिसका असर किसान अभी तक झेल रहे हैं. अब उन्हें लड़ाई का दंश झेलना पड़ रहा है.
जुन्नर के किसान राहुल बनकर ने भी आपबीती सुनाई. वे कहते हैं कि लड़ाई की वजह से एक्सपोर्टर्स ने माल खरीदना बंद कर दिया है. जो कुछ माल बाहर जा रहा है, उसका किराया (फ्रेट चार्ज) चार गुना तक बढ़ गया है. इससे अंगूर का पूरा माहौल खराब हो गया है. अभी का सीजन अंगूर के लिए सबसे अच्छा होता है. मौसम के लिहाज से भी अंगूर की कटाई बेहतर होती है क्योंकि तापमान बढ़ने से अंगूर के दाने अधिक मीठे होते हैं. इससे रेट बढ़ने के चांस अधिक होते हैं. लेकिन ईरान की लड़ाई ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. अभी 60 परसेंट तक अंगूर की हार्वेस्टिंग बाकी है. जब तक लड़ाई चलेगी तबतक अंगूर का सीजन खत्म हो जाएगा. बाद में किसान का माल कोई नहीं पूछेगा, न विदेशी मार्केट में और न लोकल बाजारों में.
लड़ाई शुरू होने और एक्सपोर्ट रुकने से किसान की होल्डिंग कैपेसिटी खत्म हो रही है. किसान के पास अंगूर जैसे फल स्टोर करने का कोई साधन नहीं होता. कोल्ड स्टोरेज की सुविधा महंगी पड़ती है. जिन किसानों का माल पोर्ट पर फंसा है, उनके लिए तो मार बहुत बड़ी है. किसान और जानकार बताते हैं कि लड़ाई का प्रभाव आने वाले दिनों में अधिक होगा. किसानों का पेमेंट फंसेगा, एक्सपोर्ट महंगा होने से उनकी कमाई और मुनाफा दोनों घटेगा.
इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि इस रुकावट से बहुत अधिक मात्रा में पैदावार पर असर पड़ सकता है. महाराष्ट्र ग्रेप ग्रोअर्स एसोसिएशन के अनुसार, पोर्ट पर पहले से पड़े लगभग 5,000 से 6,000 टन अंगूर तुरंत खतरे में हैं, जबकि 10,000 टन एक्सपोर्ट-क्वालिटी वाले अंगूर अभी भी अंगूर के बागों में एक्सपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं. कुल मिलाकर, अगर खाड़ी देशों को एक्सपोर्ट रुका रहा तो महाराष्ट्र से 16,000 टन तक अंगूर पर असर पड़ सकता है. किसानों और व्यापारियों को डर है कि एक्सपोर्ट-ग्रेड अंगूर जल्द ही घरेलू बाजारों में आ सकते हैं, जिससे सप्लाई बढ़ जाएगी और कीमतों पर दबाव पड़ेगा.
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