Cotton Farming: ऑर्गेनिक कॉटन में दुनिया का नंबर-1 भारत, फिर भी क्यों परेशान हैं किसान?

Cotton Farming: ऑर्गेनिक कॉटन में दुनिया का नंबर-1 भारत, फिर भी क्यों परेशान हैं किसान?

भारत ऑर्गेनिक कॉटन उत्पादन में दुनिया में टॉप पर है, लेकिन इससे जुड़े किसान आज भी आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं. सर्टिफिकेशन में देरी, कम पैदावार, महंगी मजदूरी और बाजार में उचित मूल्य न मिलना उनकी बड़ी समस्याएं हैं. इस रिपोर्ट में जानिए ऑर्गेनिक कॉटन खेती की चुनौतियां और इसके भविष्य को बेहतर बनाने के उपाय.

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Cotton Farming: ऑर्गेनिक कॉटन में दुनिया का नंबर-1 भारत, फिर भी क्यों परेशान हैं किसान?ऑर्गेनिक कॉटन के संकट की कहानी

भारत ऑर्गेनिक कॉटन की खेती में पूरी दुनिया में नंबर वन है. इसके बावजूद इसे उगाने वाले किसानों की हालत दयनीय है. इसके कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण ऑर्गेनिक खेती के सर्टिफिकेशन में देरी है. किसान को कॉटन की ऑर्गेनिक खेती का सर्टिफिकेट तीन से पांच साल बाद ही मिल पाता है. यह सर्टिफिकेट सरकारी या प्राइवेट एजेंसियां देती हैं जिसके लिए किसानों को लंबा इंतजार करना होता है. इसके लिए दो बार फील्ड ट्रायल होता है-पहली बार खेत की तैयारी का जायजा तो दूसरी बार फसल आने पर उसकी मॉनिटरिंग की जाती है. यह प्रक्रिया लंबा समय मांगती है जिससे ऑर्गेनिक फार्मिंग के सर्टिफिकेशन में देरी होती है. 

रिपोर्ट्स में खुलासा हुआ है कि किसान अनजाने में या जागरुकता की कमी से, कई बार ऑर्गेनिक खेती की मुश्किल शर्तों को भूल जाते हैं या उसे ठीक से फॉलो नहीं कर पाते. कई बार किसान मिट्टी में या फसल पर केमिकल खाद और पेस्टिसाइड्स का छिड़काव कर देते हैं. इससे ऑर्गेनिक फार्मिंग की शर्तें टूट जाती हैं और किसान को ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन नहीं मिल पाता. अगर किसी तरह सर्टिफिकेट मिल भी जाए तो निर्यात में यह आर्गेनिक उपज फेल हो जाती है क्योंकि विदेशी छानबीन में 'केमिकल जहर' के अंश मिल जाते हैं. इससे किसान की पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है. ये ऐसे कारण हैं जो भारत ऑर्गेनिक कॉटन फार्मिंग में नंबर वन होते हुए भी अपने किसानों को पूरी तरह से आर्थिक सुरक्षा नहीं दे पाता. 

ऑर्गेनिक फार्मिंग की मुश्किलें

सरकार का नारा है कि रासायनिक खादों के प्रयोग को कम करना है और बायोफर्टिलाइजर में आत्मनिर्भर होना है. इसी कड़ी में खेती में ऑर्गेनिक और बायो फर्टिलाइजर के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है. कॉटन की ऑर्गेनिक फार्मिंग भी इसी का एक नमूना है, लेकिन इसमें किसानों के सामने कई चुनौतियां हैं. 

सबसे बड़ी चुनौती पैदावार की है. किसान पारंपरिक तरीके से कॉटन की खेती को छोड़कर ऑर्गेनिक खेती में आ तो जाता है, लेकिन उसे मनचाहा उत्पादन नहीं मिलता. यह समस्या तब और विकराल हो जाती है जब किसान को ऑर्गेनिक कॉटन का प्रीमियम दाम नहीं मिलता. यहां किसान को दोहरा झटका लगता है-एक, पैदावार कम और दूसरा, दाम में कमी.

दूसरी बड़ी चुनौती है ऑर्गेनिक फार्मिंग में श्रम की. इसमें हाथ से अधिक काम होता है, मशीन से कम. खासकर महिलाएं बड़ा रोल निभाती हैं. खेत से खरपतवार निकालने से लेकर कपास की तुड़ाई तक, मशीन की तुलना में मैनुअल काम अधिक होता है. जबकि ऐसे काम बहुत महंगे हो चले हैं. एक तो लेबर की शॉर्टेज है, उपर से मेहनताना अधिक. यही कारण है कि ऑर्गेनिक खेती करने वाला किसान अपने को नुकसान में पाता है.

अगली चुनौती बायो पेस्टिसाइड्स और अन्य इनपुट्स की है. केमिकल कीटनाशकों के ऑर्गेनिक विकल्प (जैसे नीम-बेस्ड स्प्रे) अक्सर कम असरदार होते हैं और उनकी शेल्फ-लाइफ भी कम होती है, जिससे फसलें कीड़ों के हमले के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं. इसके अलावा, सर्टिफिकेशन की महंगी और लंबी प्रक्रिया (जैसे, यह वेरिफाई करना कि नॉन-GM बीज और ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल किया गया है) छोटे किसानों को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाती है.

ऑर्गेनिक कॉटन का भविष्य

2000 के दशक की शुरुआत से ही भारत के कॉटन बीज बाजार पर BT कॉटन बीजों का दबदबा रहा है. नॉन-BT कॉटन बीजों की तुलना में BT कॉटन बीज महंगे होते हैं और इनके उत्पादन में भी अधिक लागत आती है. साथ ही ऑर्गेनिक खाद और बायो-पेस्टिसाइड्स की पर्याप्त उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती है. दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत की ऑर्गेनिक कॉटन उत्पादकता काफी कम है. तुर्की में जहां 1687 किलो प्रति हेक्टेयर है तो भारत में केवल 508 किलो प्रति हेक्टेयर. यह अंतर भारत की खेती प्रणाली में मौजूद कमजोरियों को दिखाता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सप्लाई चेन मजबूत की जाए, बेहतर बीज किसानों तक पहुंचें और बाजार में उचित दाम मिलने की गारंटी हो, तो भारत की ऑर्गेनिक कॉटन खेती को काफी मजबूत किया जा सकता है. साथ ही सर्टिफिकेशन प्रक्रिया को सरल और तेज बनाने की जरूरत है, ताकि किसान जल्द से जल्द इसका लाभ उठा सकें. देश में ऑर्गेनिक कॉटन की संभावनाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन जब तक किसानों को खेती में बेहतर तकनीक और आसान प्रक्रियाएं नहीं मिलेंगी, तब तक यह क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाएगा.

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