कुट्टू का आटादेश में व्रत-त्योहार का सीजन शुरू हो चुका है. बहुत जल्द नवरात्रि शुरू होगी. अभी कुछ दिन पहले ही गणेश उत्सव बीता है. इन दिनों में लोग उपवास रखते हैं या व्रत स्पेशल खाना बनाते हैं. उपवास में भी ऐसे फल या अनाज का सेवन करते हैं जो फलाहारी किस्म का हो. इसमें कुट्टू का नाम सबसे ऊपर आता है. अधिकांश लोग उपवास में कुट्टू के आटे से बने व्यंजन को खाते हैं और शरीर को ऊर्जा देते हैं. इसे देखते हुए कुट्टू के बारे में जानना जरूरी है कि इसकी खेती, कब, कहां और कैसे की जानी जानी चाहिए.
यहां कुट्टू के बारे में जान लेना जरूरी है कि यह एक ग्लूटेन फ्री अनाज है जिसे स्वास्थ्य के लिहाज से उत्तम माना जाता है. इसमें पोषक तत्व भरे हुए हैं और इसे जैविक अनाज की श्रेणी में रखा गया है. हालांकि धान, गेहूं की तरह यह घास वाला अनाज नहीं है, लेकिन इसे पीसने पर गेहूं की तरह ही आटा निकलता है जिसका इस्तेमाल पकाने और खाने में किया जाता है. कुट्टू को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल के मरीजों के लिए अच्छा माना जाता है.
कुट्टू को ठंडी और नम जलवायु पसंद है, इसलिए पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती है. अरुणाचल प्रदेश का तवांग इलाका इसके लिए प्रसिद्ध है. पहाड़ी इलाकों में कुट्टू आसानी से उग जाता है. कम दिनों में तैयार होने वाली फसल कुटटू 60-90 दिनों में तैयार हो जाती है. किसान इसकी जल्दी कटाई कर सकते हैं.
कुट्टू की खेती के लिए हल्की दोमट मिट्टी चाहिए होती है जिसमें जल निकासी अच्छी हो. कुट्टू को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती. बारिश के पानी से भी काम चल सकता है. बारिश ना हो तो एक या दो सिंचाई में इसकी फसल तैयार हो जाती है. इसकी उन्नत किस्म की बात करें तो आईसीएआर द्वारा विकसित हिमप्रिया उन्नत किस्म है.
हिमप्रिया किस्म 90 दिनों में तैयार हो जाती है और औसत उपज 12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देती है. यह किस्म लीफ ब्लाइट और डाउनी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील है. इस किस्म का दाना बड़ा होता है और आटे की क्वालिटी बेहद अच्छी होती है.
व्रत के समय कुटू का आटा बहुत लोकप्रिय है. इससे रोटी, पूरी, पकौड़ी, मिठाई आदि उत्पाद बनाए जाते हैं. कई जनजातीय समुदाय इसका उपयोग पारंपरिक पेय बनाने में भी करते हैं. कुछ स्थानों पर यह धार्मिक अनुष्ठानों में भी प्रयोग होता है. ICAR के मुताबिक, कुट्ट जैसी फसल अरुणाचल प्रदेश के किसानों के लिए कम भूमि में अधिक लाभवाली साबित हो सकती है. इससे न केवल पोषण सुरक्षा मिलेगी, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में जैविक खेती को भी बढ़ावा मिलेगा.
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