खरीफ प्याज की खेती से किसानों को फायदाखरीफ प्याज की बुवाई का सीजन चल रहा है और पूरे जुलाई भर खेती का काम चलेगा. इसमें पानी की जरूरत बहुत अधिक नहीं होती, इसलिए मॉनसून की धीमी चाल को देखते हुए किसी बड़ी चिंता की बात नहीं है. हालांकि मिट्टी की नमी संतोषजनक जरूर रहनी चाहिए ताकि बीज समय से अंकुरित हो सकें. खरीफ प्याज की खेती में किसानों को कुछ खास बातों का ध्यान रखना होता है क्योंकि रबी की तरह यह आसान काम नहीं होता. खरीफ प्याज की खेती जोखिम भरा काम है क्योंकि मॉनसून और बरसात के बीच इसकी बुवाई होती है. बारिश अधिक हो जाए तो बीज और नर्सरी के खराब होने का खतरा रहता है. इस बार बारिश नहीं है, इसलिए खतरे की आशंका कम है.
अगर उत्तर भारत के किसान खरीफ प्याज की खेती करते हैं, तो वे न सिर्फ अपनी आमदनी बढ़ाकर अपनी कमाई बेहतर कर सकते हैं, बल्कि सही कीमत पर प्याज की लगातार सप्लाई में भी बड़ा रोल निभा सकते हैं. लगभग हर साल नवंबर के बाद रबी प्याज का स्टॉक खत्म हो जाता है, जिससे उत्तर भारत में नवंबर-जनवरी के दौरान सप्लाई में कमी आ जाती है. इसलिए, दक्षिण भारत और दूसरे देशों से प्याज मंगाना पड़ता है, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं. इस दौरान उत्तर भारत में प्याज की कीमत 100-120 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. इसे देखते हुए खरीफ प्याज की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है.
ICAR की रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों के बीच बड़े पैमाने पर 'सेट्स' (छोटे प्याज) के जरिए खरीफ प्याज के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. इस तकनीक में, मार्च-मई में सेट्स तैयार किए जाते हैं और अगस्त तक स्टोर करके रखे जाते हैं. अगस्त के दूसरे पखवाड़े में, इन सेट्स को खेतों में दोबारा लगाया जाता है, जिनकी कटाई अक्टूबर से दिसंबर के बीच हरे या पूरी तरह विकसित प्याज (बल्ब) के तौर पर की जा सकती है.
पूरी तरह विकसित प्याज औसतन 30 रुपये प्रति किलो की कीमत पर बेचे जा रहे हैं. कई किसानों ने अपने किचन गार्डन में खरीफ प्याज के सेट्स उगाए और घरेलू जरूरतों के लिए उन्हें हरे या पूरी तरह विकसित अवस्था में काटते हैं. खरीफ प्याज की कटाई अक्टूबर से नवंबर के बीच होती है, जब प्याज की कमी के कारण इसकी कीमत बहुत ज्यादा होती है. इसलिए, खरीफ प्याज के उत्पादन से किसानों को मुनाफा होता है और इस तकनीक को राज्य के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ उत्तर भारत में भी लोकप्रिय बनाने की ज़रूरत है.
सही किस्म का चुनाव सबसे जरूरी है. खरीफ की एक आदर्श किस्म में जल्दी बल्ब बनने की क्षमता, ज्यादा प्रकाश-संश्लेषण क्षमता (photosynthetic efficiency), पतली गर्दन, बीमारियों से लड़ने की क्षमता और जल-जमाव सहने की क्षमता होनी चाहिए. एकदम सही किस्म मिलना बहुत मुश्किल है, लेकिन खरीफ सीजन के लिए 90 से 105 दिनों की परिपक्वता अवधि और पतली गर्दन वाली किस्म चुनी जानी चाहिए. एग्रीफाउंड डार्क रेड, N-53, बसवंत-780, अर्का कल्याण जैसी किस्में खरीफ सीजन में अच्छा उत्पादन देती हैं.
अलग-अलग खरीफ प्याज उत्पादक राज्यों में खरीफ प्याज लगाने का समय जून के पहले हफ्ते से अगस्त के दूसरे हफ्ते तक अलग-अलग होता है. महाराष्ट्र में, जो खरीफ प्याज का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसे जून के मध्य से जुलाई के मध्य तक लगाया जाता है. लेकिन हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश के कारण सेट्स का इस्तेमाल करके देर से खरीफ की बुवाई करना ज्यादा सही रहता है. प्याज की पैदावार पर रोपाई की तारीख को लेकर किए गए प्रयोग से पता चलता है कि अगस्त के दूसरे पखवाड़े (15 तारीख के बाद) में रोपाई करने से जून और जुलाई की रोपाई की तुलना में ज्यादा पैदावार मिलती है. खरीफ प्याज के लिए नर्सरी आमतौर पर मार्च में बोई जाती है ताकि 'सेट्स' (छोटे प्याज के कंद) तैयार किए जा सकें.
खरीफ प्याज को रबी की फसल की तुलना में बहुत कम पानी की जरूरत होती है. आम तौर पर, खरीफ फसल को 5-8 बार, देर से बोई जाने वाली खरीफ फसल को 10-12 बार और रबी फसल को 12-15 बार सिंचाई की जरूरत होती है. प्याज की जड़ें कम गहरी होती हैं, इसलिए अच्छी बढ़त और कंद (bulb) के विकास के लिए मिट्टी में सही नमी बनाए रखने के लिए बार-बार हल्की सिंचाई की जरूरत होती है. जब फसल पक जाए (कटाई से 10-15 दिन पहले) और ऊपरी हिस्सा झुकने या गिरने लगे, तो सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. इससे भंडारण के दौरान प्याज के सड़ने की संभावना कम हो जाती है.
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