खरीफ फसलों की बुवाई पिछड़ीपिछले साल की तुलना में खरीफ की बुवाई लगभग 54 लाख हेक्टेयर कम है. इसकी वजह मॉनसून नहीं बल्कि अप्रैल-मई की हीटवेव है जिसने मिट्टी की नमी को खत्म कर दिया. किसानों ने बारिश की उम्मीद में बुवाई में देरी की, लेकिन जून का महीना भी सूखा चला गया. देश के बांधों में सामान्य से ज्यादा पानी होने के वावजूद खरीफ फसलों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. अब सबकी नजरें जुलाई की बारिश पर हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई का शुरुआती दो हफ्ता सभी फसलों का भविष्य तय करेगा क्योंकि बिना मॉनसूनी बारिश के खरीफ की खेती रफ्तार नहीं पकड़ सकती.
देश में 2026 का खरीफ सीज़न मिली-जुली स्थितियों के साथ शुरू हुआ है. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 4 जून को केरल पहुंचा और देश भर में आगे बढ़ रहा है. बांधों में पानी का स्तर 10 साल के औसत से ऊपर बना हुआ है, जिससे फसल की अच्छी संभावनाएं बनी हुई हैं. हालांकि, भारतीय मौसम विभाग (IMD) का अनुमान है कि सीजन की बारिश लंबे समय के औसत (LPA) का 90 प्रतिशत होगी. अल नीनो (El Nino) की स्थिति बनने के कारण सामान्य से कम या अपर्याप्त बारिश होने की 84 प्रतिशत संभावना है. 15 जून तक, कुल बारिश सामान्य से 32 प्रतिशत कम थी, जबकि खरीफ की बुवाई पिछले साल की रफ्तार से 3 फीसद कम रही.
अप्रैल-मई में पड़ी भीषण गर्मी और लू (heatwaves) के कारण फसलों के लिए पानी की जरूरत और गर्मी से होने वाले तनाव (heat stress) का खतरा बढ़ गया, खासकर उत्तर और मध्य भारत में. इससे खरीफ फसलों की बुवाई पिछड़ गई. हालांकि बुवाई में गिरावट का यह आंकड़ा बहुत छोटा है क्योंकि किसानों ने मॉनसून की उम्मीद में बुवाई जारी रखी है. ये फसलें जैसे-जैसे बड़ी होंगी, उनकी पानी की जरूरतें बढ़ती जाएगी. इस लिहाज से उत्पादन की संभावनाओं के लिए अगले 3-4 हफ्तों में मॉनसून की बारिश बहुत अहम होगी.
अभी तक की बुवाई का हाल देखें तो कृषि मंत्रालय की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार 25 जून 2026 तक बुवाई में पिछले साल की तुलना में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अब तक कुल 182.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 236.46 लाख हेक्टेयर था. इस तरह कुल रकबे में 53.74 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है. सबसे ज्यादा असर तिलहन और कपास जैसी प्रमुख फसलों पर देखने को मिला है, जबकि धान और दलहन की बुवाई भी पीछे चल रही है.
देश की मुख्य खाद्य फसल धान (चावल) की बुवाई में इस साल कमी दर्ज हुई है. 25 जून तक धान की बुवाई 25.75 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के 34.41 लाख हेक्टेयर से 8.65 लाख हेक्टेयर कम है.
वहीं दलहन फसलों की बुवाई भी प्रभावित हुई है. दलहन का कुल रकबा घटकर 14.92 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल 21.46 लाख हेक्टेयर था. अरहर, उड़द और मूंग जैसी प्रमुख दालों के रकबे में गिरावट दर्ज की गई है.
मोटे अनाज (कोर्स सीरियल) के अंतर्गत आने वाली फसलों में भी गिरावट देखने को मिली है. कुल बुवाई क्षेत्र 31.84 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल के 36.07 लाख हेक्टेयर से कम है. मक्का जैसी प्रमुख फसल का रकबा घटकर 15.71 लाख हेक्टेयर रह गया है, जबकि पिछले साल यह 18.61 लाख हेक्टेयर था.
तिलहन फसलों की बुवाई में सबसे अधिक गिरावट दर्ज हुई है. इस साल अब तक केवल 16.99 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल यह 36.41 लाख हेक्टेयर थी. यानी तिलहन के रकबे में 19.42 लाख हेक्टेयर की भारी कमी आई है. सोयाबीन में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है, जहां बुवाई करीब 13 लाख हेक्टेयर कम हुई है.
कपास की बुवाई में भी बड़ी कमी आई है. इस साल अब तक 29.66 लाख हेक्टेयर में कपास बोया गया है, जो पिछले साल के 45.36 लाख हेक्टेयर से 15.70 लाख हेक्टेयर कम है.
हालांकि कुछ फसलों में हल्की बढ़त भी देखी गई है. गन्ने का रकबा बढ़कर 57.31 लाख हेक्टेयर हो गया है. जूट और मेस्ता की बुवाई भी मामूली बढ़कर 6.25 लाख हेक्टेयर पहुंची है.
खरीफ सीजन की इस धीमी शुरुआत ने किसानों और कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. बुवाई में कमी का असर आने वाले महीनों में उत्पादन पर भी पड़ सकता है, जिससे खाद्यान्न और तिलहन की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है. विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून की चाल और आने वाले हफ्तों में बुवाई की रफ्तार इस स्थिति को काफी हद तक तय करेगी.
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