बासमती धान खरीद के इंटरनेशनल मानकबासमती चावल देश में एक प्रसिद्ध अनाज है जिसकी खेती विश्व के कई देशों में की जाती है. हालांकि, भारत में बासमती चावल की खेती मुख्य रूप से की जाती है. जो भारत के कुछ राज्यों में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में की जाती है. वहीं देश में बासमती चावल की खेती हरियाणा और पंजाब में सबसे ज्यादा की जाती है. बासमती चावल की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी बिजनेस है. इसकी खेती से किसानों को अच्छी आमदनी होती है. इसकी खेती के अलावा, बासमती चावल का निर्यात भी किया जाता है जोकि देश के कृषि अर्थव्यवस्था में अच्छा योगदान देता है.
हालांकि, कई बार अंतरराष्ट्रीय मानकों को नहीं पूरा करने की वजह से बासमती चावल की खेप को वापस मंगवाना पड़ जाता है. ऐसे में आइये आज विस्तार से जानते हैं कि बासमती चावल खरीद के अंतरराष्ट्रीय मानक क्या हैं-
ICAR-IARI के डायरेक्टर डॉ. एके सिंह के मुताबिक, 2015 से आज की तुलना करें तो भारतीय बासमती चावल का निर्यात खासकर यूरोपीय देशों में काफी कम हुआ है. पहले लगभग पांच लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया जाता था. लेकिन मौजूदा वक्त में वो घटकर ढाई लाख टन पर आ गया है और उसका मुख्य कारण है कि यूरोपीय देशों में कुछ रासायनिक दवाएं जो चावल के अंदर पाई पायी जाती हैं, उसका मानक बहुत सख्त है. दशमलव शून्य वन पीपीएम ट्राइसाइक्लाजोल एक कृषि रसायन है जोकि एक फफूंदनाशी है और उसका प्रयोग किसान धान की फसल में ब्लास्ट या झोंका रोग के लिए करते हैं.
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यूरोपीय देशों में इसका मानक दशमलव वन पीपीएम यानी एक मिलीग्राम दवा यदि 100 किलोग्राम चावल में भी पाई जाती है तो उस खेप को निरस्त कर दिया जाता है. नतीजतन, भारतीय किसानों को इससे काफी नुकसान होता है. अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, बासमती चावल के लिए इसके अलावा भी कई और मानक हैं, जैसे- आकार, रंग, स्वाद और गंध आदि.
डायरेक्टर डॉ. एके सिंह के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के मकसद से आईसीएआर-आईएआरआई के कृषि वैज्ञानिक विगत 10 वर्षों से लगातार काम करके बासमती चावल की तीन नई किस्में पूसा बासमती 1847, पूसा बासमती 1885 और पूसा बासमती 1886 विकसित किए हैं. जिसमें पूसा बासमती 1847 को पूसा बासमती 1509 में सुधार करके बनाई गई है. पूसा बासमती 1885, पूसा बासमती 1121 को सुधार करके बनाई गई है, जबकि पूसा बासमती 1886, पूसा बासमती 1401 का सुधार करके बनाई गई है. चावल की इन तीनों किस्मों में पत्ती का झुलसा और झोंका रोग नहीं लगती है. ऐसे में अगर किसान फसल में दवा का इस्तेमाल नहीं करेंगे तो उनकी उपज आसानी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय मानकों पर खरी उतरेगी.
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