गेहूं के लिए क्या है ठंड का मतलब?उत्तर भारत के किसानों के लिए दिसंबर और जनवरी की कड़ाके की ठंड महज एक मौसम नहीं, बल्कि उनकी साल भर की मेहनत और कमाई का फैसला करने वाली घड़ी है. हमारे देश की खाद्य सुरक्षा गेहूं पर टिकी है और गेहूं की सफलता पूरी तरह कुदरत के मिजाज पर निर्भर करती है. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा समस्तीपुर के प्लांट पैथालोजी के हेड डॉ. एस.के. सिंह बताते हैं कि किसान चाहे कितनी भी अच्छी खाद या सिंचाई कर ले, लेकिन फसल की असली ताकत 'तापमान' से ही आती है.आजकल जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम अनिश्चित हो गया है, कभी अचानक धूप तेज हो जाती है तो कभी रिकॉर्ड तोड़ ठंड पड़ती है. किसानों को इस बदलाव से डरने के बजाय इसे समझने की जरूरत है. मौसम को समझकर लिया गया फैसला ही खेती को असली मुनाफे का सौदा बनाता है है. इसलिए सही समय पर सही जानकारी होना बेहद जरूरी है.
गेहूं की फसल की असली किस्मत खाद-पानी से ज्यादा 'तापमान' तय करता है. दिसंबर और जनवरी की कड़ाके की ठंड इस फसल के लिए किसी वरदान से कम नहीं होती. दिसंबर का महीना गेहूं के पौधों के बचपन जैसा होता है. डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार इसी दौरान पौधों में 'कल्ले' फूटते हैं, जो आगे चलकर फसल को घना बनाते हैं. अगर दिसंबर में तापमान 19 से 27 डिग्री के बीच रहे, जैसा 2024 में दिखा, तो पौधों की ग्रोथ शानदार होती है.वहीं, अगर दिसंबर में ठंड जल्दी बढ़ जाए जैसा 2025 में हुआ तो ऊपर से बढ़त भले ही थोड़ी धीमी लगे, लेकिन मिट्टी के अंदर पौधे की जड़ें बहुत मजबूत हो जाती हैं. यह ठंड पौधे को भविष्य के लिए ऊर्जा बटोरने और अंदरूनी ताकत देने का काम करती है. यही वह समय है जब पौधा अपनी जड़ों को गहराई तक ले जाता है और बालियों का सही आकार तय होता है.अगर दिसंबर और जनवरी के महीने में ठंड के बजाय गर्मी बढ़ जाए, तो पैदावार में बड़ी गिरावट आ सकती है. आसान भाषा में कहें, तो दिसंबर की यह 'गुलाबी ठंड' ही गेहूं की बंपर पैदावार की असली गारंटी है.
गेहूं के लिए जनवरी का महीना सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है. जनवरी का गिरता पारा गेहूं के दानों को मोटा, चमकदार और वजनदार बनाने में अहम भूमिका निभाता है. डॉ. एस.के. सिंह ने बताया कि इस बार जनवरी 2026 की शुरुआत काफी ठंडी रही, जहां शुरुआती आठ दिनों में से छह दिन पारा 6 डिग्री से नीचे चला गया. कई किसान इसे देखकर घबरा जाते हैं, लेकिन वैज्ञानिक इसे 'वर्नलाइजेशन' कहते हैं. यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें ठंड की वजह से बालियां सही समय पर और एक समान निकलती हैं. बस ध्यान यह रखना होता है कि बहुत ज्यादा पाला न पड़े, वरना पत्तियां झुलस सकती हैं. हल्की और स्थिर ठंड तो असल में फसल के लिए वरदान है. ठंड का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह फसल के पकने के समय को थोड़ा बढ़ा देती है. जब मौसम ठंडा रहता है, तो पौधे को भोजन बनाने यानि प्रकाश संश्लेषण के लिए ज्यादा समय मिलता है. इससे न केवल बालियों में दानों की संख्या बढ़ती है, बल्कि दाने भी मोटे और वजनदार बनते हैं.
हाल के दो साल क दिसंबर 2024 से लेकर जनवरी 2026 तक के तापमान के आंकड़े बताते हैं कि कुदरत हमें बंपर पैदावार का मौका दे रही है. सबसे अच्छी खबर यह है कि 2026 में मार्च के महीने में अचानक गर्मी टर्मिनल हीट बढ़ने की आशंका कम है. अगर मार्च तक मौसम सुहाना बना रहा, तो इस साल गेहूं की रिकॉर्ड तोड़ पैदावार होने की पूरी उम्मीद है. अगर किसान कृषि वैज्ञानिकों की सलाह मानकर सही समय पर सिंचाई और खाद का प्रबंधन करें बदलते तापमान के बीच अच्छी पैदावार लेने के लिए किसानों को कुछ स्मार्ट तरीके अपनाने होंगे. सबसे जरूरी है कि बुवाई नवंबर के पहले या दूसरे हफ्ते तक निपटा लें ताकि फसल को पूरी ठंड मिले. इसके अलावा, जब बहुत ज्यादा ठंड या पाला पड़ने की संभावना हो, तो खेतों में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए. सिंचाई से खेत का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है और फसल पाले से बच जाती है. साथ ही, खाद का इस्तेमाल संतुलित मात्रा में करें, क्योंकि ज्यादा यूरिया ठंड के प्रति पौधे की सहनशक्ति को कम कर सकता है.
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