रबड़ की खेतीभारतीय प्राकृतिक रबड़ क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2024–25 में कई चुनौतियों के बीच महत्वपूर्ण प्रगति की है. दरअसलस, रबड़ बागानों के रकबे में विस्तार, प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में सुधार और संस्थागत और तकनीकी सहयोग के चलते उत्पादन में बढ़ोतरी देखने को मिली है. हालांकि, घरेलू खपत में हल्की गिरावट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की अस्थिरता ने इस क्षेत्र के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं. इस बीच उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, रबड़ की खेती का कुल क्षेत्रफल पिछले वर्ष के 8.88 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 9.39 लाख हेक्टेयर हो गया है. वहीं, टैपिंग योग्य क्षेत्र 7.56 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया, जिसमें से 77.1 प्रतिशत हिस्से ने कुल उत्पादन में योगदान दिया.
उत्पादकता के आंकड़ों में भी हल्का सुधार हुआ है. दरअसल, प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 2023–24 के 1,485 किलोग्राम से बढ़कर 1,500 किलोग्राम हो गया है, जो बेहतर प्रबंधन और तकनीकी के उपयोग का संकेत देता है. उद्योग सूत्रों के अनुसार, उत्पादन 8.75 लाख टन तक पहुंच गया, जो 2.1 प्रतिशत की वृद्धि है और आरएसएस का दबदबा बना रहा, जिसकी हिस्सेदारी 63 प्रतिशत रही.
उत्पादन बढ़ने के बावजूद घरेलू खपत में मामूली गिरावट दर्ज की गई। कुल खपत घटकर 14.10 लाख टन रही। इसका मुख्य कारण ऑटो-टायर उद्योग की मांग में कमी बताया जा रहा है, जो प्राकृतिक रबड़ का सबसे बड़ा उपभोक्ता क्षेत्र है। वाहन उद्योग की सुस्ती का सीधा असर रबड़ की मांग पर पड़ा है.
घरेलू खपत में कमी के बावजूद रबड़ आयात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वित्त वर्ष 2024–25 में आयात 11.8 प्रतिशत बढ़कर 5.51 लाख टन तक पहुंच गया. भारत को रबड़ की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देश कोट डी’वोआर, इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड रहे. इन देशों से हुए आयात का कुल मूल्य लगभग 9,021 करोड़ रुपये रहा. वहीं, रबड़ निर्यात के मामले में भी सकारात्मक संकेत मिले हैं. वर्ष 2024–25 के दौरान भारत ने 4,839 टन प्राकृतिक रबड़ का निर्यात किया, जिसमें मुख्य रूप से लेटेक्स कंसंट्रेट और टीएसआर शामिल रहे. श्रीलंका भारतीय प्राकृतिक रबड़ का प्रमुख निर्यात गंतव्य बना रहा, जिसका कुल निर्यात मूल्य करीब 75 करोड़ रुपये रहा.
सूत्रों के अनुसार, मूल्य वर्धित उत्पादों के संदर्भ में, भारत के रबड़ क्षेत्र ने उल्लेखनीय मजबूती का प्रदर्शन किया, जिसमें 2024-25 के दौरान 43,202 करोड़ रुपये के रबड़ उत्पादों का निर्यात किया गया, जो वैश्विक रबर बाजार में देश की बढ़ती उपस्थिति को दर्शाता है.
केरल प्लांटर्स एसोसिएशन (एपीके) के अध्यक्ष टी.आर. राधाकृष्णन अनुसार, वर्ष 2025 वैश्विक प्राकृतिक रबड़ सेक्टर के लिए निर्णायक रहा. इस दौरान मध्यम उत्पादन वृद्धि, लगातार बढ़ती खपत, अस्थिर कीमतें और उत्पादकों के लिए सख्त कारोबारी माहौल देखने को मिला. चीन और भारत जहां मांग के प्रमुख केंद्र बने रहे, वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया आपूर्ति का मुख्य हब रहा. मौसम संबंधी जोखिम, कम री-प्लांटेशन दर, टैरिफ अनिश्चितताएं और आपूर्ति-मांग का अंतर कीमतों को प्रभावित करता रहा.
साल की शुरुआत में आपूर्ति की तंगी और मौसम संबंधी व्यवधानों के कारण रबड़ कीमतें कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गई थीं. लेकिन अप्रैल और मई में वैश्विक आर्थिक चिंताओं के चलते मांग कमजोर हुई और कीमतों में करीब 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.
हारनेज़ फिन ईएसपीएल के वेल्थ मैनेजमेंट सर्विस के निदेशक हरीश एमवी ने कहा कि 2026 में वैश्विक प्राकृतिक रबड़ बाजार में स्थिरता बनी रहने की उम्मीद है. साथ ही आपूर्ति सीमित रहने पर कीमतों में कुछ वृद्धि की संभावना है. हालांकि, कीमतों में उतार-चढ़ाव की उम्मीद की जानी चाहिए, क्योंकि परिणाम काफी हद तक टायर और ऑटोमोबाइल की मांग, सिंथेटिक रबड़ की कीमतों और घरेलू आपूर्ति पर निर्भर करेगा.
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