उत्तराखंड में फलों के उत्पादन में 30 प्रतिशत की कमी भी देखी गई है.तेजी से बदलती जलवायु ने उत्तराखंड में फलों के उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है. यहां सेब, नाशपाती, आड़ू, आलूबुखारा और खुबानी फलों की होने वाली बंपर पैदावार बीते सात वर्षों से चिंताजनक रूप से कम हो गई है. वर्ष 2020 से उत्तराखंड में इन प्रमुख फलों की बागवानी और उत्पादन पर जलवायु का अधिक प्रभाव पड़ा है. उत्पादन में यह गिरावट ट्रापिकल यानी उष्णकटिबंधीय फलों की तुलना में टेंपरेट यानी शीतोष्ण फलों के उत्पादन में देखी जा सकती है. क्लाइमेट सेंट्रल ने उत्तराखंड में फलों के उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कई अहम तथ्य सामने आए हैं. गर्म होते मौसम की वजह से फलों की कई प्रजातियों का उत्पादन तेजी से घट कर रहा है जिससे किसान ट्रापिकल यानी उष्णकटिबंधीय फलों के उत्पादन की ओर बढ़ रहे हैं. क्योंकि ये फल बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी उगने में सक्षम हैं.
क्लाइमेट सेंट्रल की स्टडी के अनुसार उत्तराखंड में बागवानी के क्षेत्रफल में भारी कमी के साथ मुख्य फलों के उत्पादन में भी कमी देखी जा रही है. हिमालयी क्षेत्र में ऊंचाई वाले स्थानों पर आड़ू, खुबानी, आलूबुखारा और अखरोट जैसे फलों के उत्पादन में सबसे अधिक कमी देखी गई है. सेब और नींबू के उत्पादन में अपेक्षाकृत कम गिरावट आ रही है. वर्ष 2016-17 में उत्तराखंड में 25,201.58 हेक्टेयर क्षेत्र में सेब का उत्पादन किया जाता था जोकि वर्ष 2022-23 में घटकर 11,327.33 हेक्टेयर हो गया है. इसी के साथ इस अवधि में फलों के उत्पादन में 30 प्रतिशत की कमी भी देखी गई है. नींबू की विभिन्न प्रजातियों में 58 प्रतिशत की भारी कमी देखी गई है.
बागवानी क्षेत्र में क्रमशः 49 और 42 प्रतिशत की कमी के बावजूद आम और लीची का उत्पादन कमोबेश स्थायी रहा है. हालांकि दोनों फलों के उत्पादन में क्रमशः 20 एवं 24 प्रतिशत की कमी देखी गई है.
उत्तराखंड में वर्ष 2016-17 से 2022-23 के बीच फलों के उत्पादन में बड़ी कमी विभिन्न प्रकार के फलों के संदर्भ में इन्हें उगाने के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है. बीते सात वर्ष में चुनिंदा फलों के उत्पादन में उल्लेखनीय कमी कृषि रणनीतियों, भूमि के आवंटन, बाजार की परिस्थितियों और संभवतः कुछ फलों पर पड़ रहे पर्यावरणीय प्रभाव को दर्शाती है.
बागवानी में इस प्रकार के बड़े बदलावों को कुछ हद तक धरती के बढ़ते तापमान से समझा जा सकता है. तापमान के पैटर्न में बदलाव से फल का विकास और उत्पादन प्रभावित होता है. अधिक तापमान के कारण फल उत्पादन पर गर्मी, पानी की अनुपलब्धता और बारिश के बदलते क्रम का प्रभाव हो सकता है जिससे उत्पादन पर असर होता है. इसके साथ ही बदलता तापमान फलों में कीटों और रोगों के प्रभाव को भी बदल सकता है, जिससे कीट नियंत्रण की अधिक जरूरत हो सकती है.
सर्दियों में शीतोष्ण पेड़ सुसुप्तावस्था में चले जाते हैं ताकि कम तापमान में वृद्धि रोककर अपनी कोशिकाओं को नुकसान से बचा सकें. अत्यधिक सर्दी, जिसे चिलिंग रिक्वायरमेंट भी कहते हैं. इन पेड़ों को सुसुप्तावस्था से बाहर लाकर फल लगने की प्रक्रिया को आरंभ करने में मदद करती है. गर्म सर्दियों, कम बर्फबारी और बारिश के कारण फल लगने की प्रक्रिया में बदलाव आया होगा जिससे अंततः फल उत्पादन प्रभावित होता है.
आईसीएआर-सीएसएलआइआई के कृषि विज्ञान केंद्र में बागवानी विभाग के प्रमुख और वरिष्ठ विज्ञानी डा. पंकज नौटियाल कहते हैं कि सेब जैसी परंपरागत शीतोष्ण यानी टेंपरेट फसलों को दिसंबर से मार्च की अवधि में 1,200 से 1,600 घंटे की अवधि के लिए सात डिग्री सेल्सियस से कम की चिलिंग टेंपरेचर की रिक्वायरमेंट होती है. पिछले 5-10 वर्षों में हुई बर्फबारी की तुलना में सेब की फसल को 2-3 गुना अधिक बर्फबारी चाहिए. कम बर्फबारी के कारण क्वालिटी और उत्पादन में कमी हुई है. रानीखेत के किसान मोहन चौबटिया कहते हैं कि बारिश और बर्फ कम होने से बहुत ही दिक्कत हो रही है. अल्मोड़ा में बीते दो दशक में ठंडे स्थानों पर होने वाले फलों के उत्पादन में आधे तक की कमी आई है. जो किसान सिंचाई नहीं कर सकते, वे सबसे अधिक प्रभावित हैं.
नई दिल्ली स्थित आईसीएआर-आइईएआरआई के एग्रीकल्चर फिजिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. सुभाष नटराज कम होते फल उत्पादन से उत्तराखंड की धुंधली होती तस्वीर की बात करते हुए कहते हैं कि कम अवधि में तापमान में बदलाव और ट्रेंड चिंताजनक हैं और मौसम संबंधी कारकों में लंबी अवधि के ट्रेंड के अध्ययन की जरूरत है, विशेषकर फसल और पैटर्न में बदलाव या हस्तांतरण के संबंध में. जलवायु अनुकूल कृषि तरीकों की तरफ बढ़ने की बात करते हुए डॉ. नटराज कहते हैं जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव कम करने के लिए लोकेशन के हिसाब से जलवायु अनुकूल प्रजातियों की पहचान और विकास करना होगा. विपरीत मौसमी परिस्थितियों से किसानों को बचाने के लिए क्लाइमेट फाइनेंसिंग भी बहुत जरूरी है. एक और अहम बात यह कि गांव के स्तर पर कृषि मौसम संबंधी सलाहकार सेवा समयबद्ध तरीके से पहुंचनी चाहिए ताकि सभी संबंधित पक्ष समय रहते तैयार कर सकें और निर्णय ले सकें.
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