जुलाई में करें इन फसलों की खेतीजुलाई का महीना खेती-किसानी के लिए सबसे ज्यादा व्यस्त और अहम समय होता है, जो पूरे देश की कृषि व्यवस्था की मजबूत बुनियाद रखता है.यह महीना खरीफ की फसलों के लिए सबसे खास माना जाता है, खासकर उन इलाकों में जहाँ खेती पूरी तरह मानसून की बारिश पर निर्भर करती है. जुलाई में देश के ज्यादातर हिस्सों में मानसून आ जाता है, इसलिए खेतों से जुड़े सभी जरूरी कामों को बिना किसी देरी के सही समय पर निपटाना बहुत जरूरी है. हमारे देश के कुल अनाज उत्पादन में खरीफ फसलों का योगदान आधे से भी ज्यादा होता है, जिनमें धान, मक्का, बाजरा, मूंग और उड़द सबसे मुख्य फसलें हैं. अगर किसान मक्का बाजरा और उर्द -मूंग की ज्यादा पैदावार देने वाली उन्नत प्रजातियों का सेहतमंद बीज, सही खाद प्रबंधन करके खेती करें तो बेहतर आमदनी कमा सकते है.
मक्का की उन्नत खेती के लिए पूसा के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जहां सिंचाई की सुविधा है, वहाँ मानसून आने से 10-15 दिन पहले ही मक्का बो देना चाहिए, जबकि बारिश पर निर्भर खेतों में पहली अच्छी वर्षा के बाद ही बुआई करें. ज्यादा पानी जमा होने वाले क्षेत्रों में मेड़ बनाकर और कम पानी वाले इलाकों में गहरी खाइयों (कूंड़) में मक्का बोना सबसे अच्छा रहता है. किस्मों के हिसाब से प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा तय होती है; जैसे हाइब्रिड के लिए 20-22 किलो, संकुल के लिए 18-20 किलो, देसी किस्मों के लिए 16-18 किलो और स्वीटकॉर्न के लिए सिर्फ 7-10 किलो बीज काफी होता है. अच्छे जमाव के लिए बीजों को रातभर पानी में भिगोकर सुबह छांव में सुखाने के बाद ही बोना चाहिए,
बाजरे की सीधी बुआई और नर्सरी बाजरे की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है. यह फसल भारी बारिश वाले उन इलाकों में भी अच्छी होती है जहाँ पानी निकलने का सही इंतजाम हो. बाजरे की सीधी बुआई का सबसे अच्छा समय जुलाई का दूसरा पखवाड़ा 15 से 30 जुलाई़ माना जाता है और इसके लिए एक हेक्टेयर में 4-5 किलो बीज की जरूरत होती है.अगर किसी वजह से बाजरे की सीधी बुआई समय पर न हो पाए, तो देर से बुआई करने के बजाय पौधों की रोपाई करना ज्यादा फायदेमंद होता है. इसके लिए जुलाई की शुरुआत में ही 500-600 वर्ग मीटर की छोटी क्यारी में 2-2.5 किलो बीज बोकर करीब 2-3 सप्ताह में स्वस्थ पौध तैयार कर लेनी चाहिए.
जब बाजरे के इन छोटे पौधों को क्यारियों से उखाड़ा जाए, तो उस समय मिट्टी में अच्छी नमी होनी चाहिए ताकि उनकी नाजुक जड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे. मुख्य खेत में पौधों की रोपाई करते समय लाइन से लाइन की दूरी 45-50 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे का फासला 10-15 सेंटीमीटर रखना चाहिए। खेत में रोपाई करते वक्त एक जगह पर सिर्फ एक ही पौधा लगाना चाहिए। इस वैज्ञानिक तरीके को अपनाने से फसल की बढ़वार अच्छी होती है और पैदावार में भी भारी इजाफा होता है.
खरीफ के मौसम में दलहनी फसलों जैसे मूंग और उड़द के लिए हमेशा ऊंचा या समतल और बेहतरीन जल निकास वाला खेत चुनना चाहिए ताकि बारिश का फालतू पानी आसानी से बाहर निकल सके. उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में इन्हें मटियार दोमट से लेकर रेतीली दोमट मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है, जिसका पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच हो. मूंग की बुआई जुलाई के मध्य से लेकर अगस्त के दूसरे हफ्ते तक और उड़द की बुआई जुलाई के प्रथम पखवाड़े के भीतर ही पूरी कर लेनी चाहिए.
खेतों में खाद का इस्तेमाल हमेशा मिट्टी की जांच रिपोर्ट के आधार पर ही करना चाहिए। आम तौर पर मक्का और बाजरा जैसी फसलों में फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुआई के समय ही लाइनों में 3-4 सेंटीमीटर की गहराई पर देनी चाहिए, जबकि नाइट्रोजन की बची हुई आधी मात्रा फसल उगने के 4-5 हफ्ते बाद खड़ी फसल में छिड़कनी चाहिए.खरपतवार पर काबू पाने के लिए मक्का में पहली निराई 15 दिन और दूसरी 35-40 दिन बाद करें; साथ ही बुआई के शुरुआती दो दिनों के भीतर 'एट्राजीन' या 'स्टाम्प 30 ई.सी.' जैसी दवाओं का छिड़काव करने से अनचाही घास आसानी से नष्ट हो जाती है.
ये भी पढ़ें:
मौत के सैलाब पर जिंदगी का जुगाड़! उत्तराखंड के गांव में पेड़ से बना पुल बना सहारा
यूपी में कमजोर पड़ा मॉनसून, धान समेत खरीफ फसलों के लिए कृषि मंत्री शाही ने दिए ये निर्देश
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today