कपास उत्पादन में गिरावट. (सांकेतिक फोटो)फसल सीजन 2023-24 में कपास का उत्पादन अपने 15 साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है. इस सीजन में भारतीय कपास की फसल का आकार 170 किलोग्राम की 294.10 लाख गांठ होने का अनुमान लगाया गया है. कहा जा रहा है कि कपास उत्पादन में ये गिरावट खराब मौसम और कीट के प्रकोप की वजह से आई है. व्यापार संगठन कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अतुल गनात्रा का कहना है कि कम उत्पादन और अधिक कपास की खपत के कारण हमारी बैलेंस शीट बिगड़ गई है. वहीं, एक्सपर्ट का कहना है कि कपास के उत्पादन में गिरावट आने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है.
द इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, सीएएल फसल समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस सीजन में भारतीय कपास की फसल का आकार 170 किलोग्राम की 294.10 लाख गांठ होने का अनुमान है. हालांकि, यह पिछले साल की तुलना में 8 प्रतिशत कम है और 15 वर्षों में सबसे अधिक कम है. सीएआई द्वारा जारी मीडिया विज्ञप्ति में कहा गया है कि कपास व्यापार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कपास का उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए.
दुनिया में सबसे अधिक कपास की खेती भारत में होती है. दुनिया के कुल कपास रकबे का 33 प्रतिशत भारत के पास है. पूरी दुनिया में कपास का रकबा 329.52 लाख हेक्टेयर है, जबकि यहां पर लगभग 125 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती होती है. खास बात यह है कि भारत में कपास की उपज भी ज्यादा है. अतुल गनात्रा ने कहा कि इस बार 396 किलोग्राम लिंट प्रति हेक्टेयर यानी 170 किलोग्राम की 2.33 गांठें होने की उम्मीद है, जो दुनिया की प्रति हेक्टेयर 675 किलोग्राम लिंट की औसत उपज की तुलना में बहुत कम है. हालांकि, 2013-14 में हमारी कपास की पैदावार 572 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई थी.
ये भी पढ़ें- ये हैं बागवानी की 5 सबसे महत्वपूर्ण योजनाएं, किसान उठा सकते हैं सुविधाओं का लाभ
गनाटा ने कहा कि अब हमारे यहां कपास की पैदावार लगभग 30 प्रतिशत कम हो गई है. हमारी कपास की उपज में इस कमी का मुख्य कारण हमारी बीटी बीज तकनीक है, जो बहुत पुराना है. जबकि, हमें अब नए बीजों की जरूरत है. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो भी हमारी कपास की फसल को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा रहे हैं, क्योंकि हमारा 73 प्रतिशत क्षेत्र असिंचित है. इसके अलावा पिंक बॉल वर्म के हमले से हमारी पैदावार कम हो रही है.
सीएआई द्वारा किए गए राज्य-वार कपास खपत सर्वेक्षण के अनुसार, यदि कपड़ा उद्योग पूरी 100 प्रतिशत क्षमता के साथ चलता है, तो उद्योग को लगभग 414 लाख गांठ की आवश्यकता होगी. इसके विपरीत, हमारा उत्पादन केवल 294 लाख गांठ है. इससे मिलों को नुकसान हो रहा है और वे पूरे साल 100 प्रतिशत क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रही हैं. इसके अलावा, भारत में कपास के आयात पर 11 प्रतिशत शुल्क के कारण मिलें आयात करने में असमर्थ हैं. गनात्रा ने कहा कि कपास अपना परिचालन पूरी क्षमता से चलाएगा.
ये भी पढ़ें- Pashupalan: ठंड में पशुओं का रखें खास खयाल, ये बीमारी है बेहद खतरनाक
व्यापार मंडल के अनुसार, विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा मिलों के विस्तार के लिए सब्सिडी देने की अनुकूल नीति के कारण, कई मिलें अपनी कताई क्षमता बढ़ाने के लिए अपनी धुरी बढ़ा रही हैं. भारत में हर साल 15-20 लाख स्पिंडल की वृद्धि हो रही है. अगर यही प्रवृत्ति जारी रही, तो एक साल के भीतर हमारी कपास की खपत क्षमता 450 लाख गांठ प्रति वर्ष हो जाएगी.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today