सूखे से किसान बेहालमहाराष्ट्र सरकार ने राज्य के 358 में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है. बारिश की कमी और लंबे समय तक बने सूखे अंतराल ने खरीफ फसलों, पशुओं के चारे और पेयजल की स्थिति को प्रभावित किया है. मराठवाड़ा में बारिश की कमी करीब 38 फीसदी, विदर्भ में करीब 27 फीसदी और पूरे महाराष्ट्र में करीब 18 फीसदी दर्ज की गई है. मराठवाड़ा के भीतर भी हालात अलग-अलग हैं. छत्रपति संभाजीनगर में कमी करीब 16 फीसदी से लेकर हिंगोली में करीब 48 फीसदी तक है.
महाराष्ट्र सरकार के 26 सितंबर के शासनादेश के तहत 265 तालुकों को सूखा आकलन प्रक्रिया के Trigger-1 में रखा गया है. इसके तहत फसल लोन के पुनर्गठन, कृषि ऋण की वसूली पर रोक, कृषि पंपों के बिजली बिल में रियायत और कृषि कनेक्शनों को बिजली आपूर्ति जारी रखने जैसे उपाय किए जा सकते हैं. सरकार ने प्रभावित इलाकों में पेयजल और चारे की व्यवस्था के भी निर्देश दिए हैं. साथ ही फसल नुकसान का पंचनामा कराने को कहा गया है.
अधिकारियों को खेतों में फसलों की वास्तविक स्थिति दर्ज करने के लिए तस्वीरें लेने और जीपीएस लोकेशन के साथ रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं. इन आकलनों के आधार पर नुकसान की स्थिति सामने आने के बाद आर्थिक सहायता तय की जाएगी. मौजूदा सूखे में फसल नुकसान के लिए अभी सभी किसानों पर लागू होने वाली एक समान मुआवजा राशि घोषित नहीं की गई है.
धाराशिव में लंबे समय तक बारिश नहीं होने से सोयाबीन और दूसरी खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचा है. जिला स्तर पर सूखा घोषित होने से पहले किए गए आकलन में कई इलाकों में फसल नुकसान 50 से 90 फीसदी तक रहने का अनुमान सामने आया था. किसानों के मुताबिक, अगस्त में बारिश का लंबा अंतराल उस समय आया, जब सोयाबीन की फसल फूल और फलियां बनने की अवस्था में थी. बारिश रुकने से खेतों में खड़ी फसल प्रभावित हुई और उत्पादन की उम्मीद कमजोर हो गई.
कालंब तहसील के बांगरवाड़ी गांव के किसान अचरू बांगर के सामने खेती के साथ पशुपालन बचाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है. उनके पास 10 गाय हैं. अच्रू बांगर के मुताबिक सोयाबीन की फसल पानी की कमी से खराब होने के बाद उन्होंने डेयरी से आय बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन अब पशुओं के लिए चारे का इंतजाम मुश्किल हो रहा है.
अचरू बांगर ने बताया कि उन्हें अब पशुओं के लिए दूसरे तालुका से चारा लाना पड़ रहा है. कई बार दूसरे किसानों के खेतों की मेड़ से हरा चारा काटकर पशुओं को खिलाना पड़ता है. उनके पास मौजूद चारा करीब एक महीने तक ही चल पाएगा. अगर हालात नहीं सुधरे तो उन्हें अपने पशुओं को चारा शिविरों में ले जाना पड़ सकता है.
पानी का संकट ग्रामीण खेतों तक ही सीमित नहीं है. धाराशिव शहर के निवासी अशोक चव्हाण के मुताबिक उनके इलाके में मार्च से टैंकर के जरिए पानी की आपूर्ति हो रही है. उनके क्षेत्र में करीब 15 दिन में एक बार टैंकर पहुंचता है. पिछले तीन महीनों में परेशानी और बढ़ी है. आसपास की झीलें, कुएं और बोरवेल सूखने के बाद परिवार घरेलू जरूरतों के लिए भी टैंकर के पानी पर निर्भर हैं. कई घरों के बाहर पानी की टंकियां और ड्रम रखे नजर आते हैं.
धाराशिव के किसानों के लिए मौजूदा सूखा पिछले साल के नुकसान की परेशानी के साथ जुड़ गया है. वर्ष 2025 में मराठवाड़ा के कई हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ से कृषि भूमि और फसलों को नुकसान हुआ था. महाराष्ट्र सरकार ने प्रभावित किसानों के लिए हजारों करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी. लेकिन धाराशिव के कुछ किसानों का कहना है कि पिछले नुकसान की सहायता अभी तक उनके खातों में नहीं पहुंची है.
कालंब के शिवसेना यूबीटी विधायक कैलास पाटील ने पिछले साल घोषित राहत पैकेज के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं. इंडिया टुडे से बातचीत में पाटील ने कहा कि सरकार ने करीब 32,000 करोड़ रुपये की सहायता घोषित की थी, लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसमें से कितनी राशि वास्तव में किसानों तक पहुंची और कितनी रकम प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिए उनके बैंक खातों में जमा हुई. पाटील ने आरोप लगाया कि राहत दावों की प्रक्रिया में अलग-अलग शर्तें और मानदंड लागू किए गए, जिसके कारण किसानों को घोषित सहायता की तुलना में कम रकम मिली.
पिछले साल के नुकसान को लेकर किसानों के बीच 47,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की सहायता का भी जिक्र हो रहा है. हालांकि, यह राशि हर प्रकार के फसल नुकसान के लिए निर्धारित मुआवजा नहीं है. राहत के नियमों में जमीन बह जाने या कटाव, भूस्खलन, नदी की धारा या जल प्रवाह में बदलाव जैसी विशेष परिस्थितियों में इस तरह की सहायता का प्रावधान है. इसलिए 47,000 रुपये प्रति हेक्टेयर को हर प्रभावित किसान के लिए मिलने वाला मुआवजा नहीं माना जा सकता.
वाशी तहसील के 47 वर्षीय एक किसान ने बताया कि पिछले साल भारी बारिश के दौरान उनके खेत में पानी भर गया था और मिट्टी बह गई थी. किसान के मुताबिक अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर पंचनामा भी किया था. इसके बावजूद एक साल बाद तक उनके बैंक खाते में मुआवजे की राशि जमा नहीं हुई. उनका कहना है कि राहत में देरी के कारण कर्ज चुकाना मुश्किल हो रहा है. किसान का सवाल है कि जब पिछले साल के नुकसान की सहायता नहीं मिली तो इस साल हुए नुकसान का सामना कैसे किया जाएगा.
कालंब तहसील के बांगरवाड़ी के एक अन्य किसान ने बताया कि उनका नाम सरकार की कर्जमाफी योजना के लाभार्थियों की पहली सूची में शामिल था. इसके बावजूद योजना का लाभ अभी तक उनके बैंक खाते में जमा नहीं हुआ है. किसानों के मुताबिक, खेती की बढ़ती लागत, फसल नुकसान, पानी की कमी और चारे के संकट के बीच राहत राशि में देरी उनकी आर्थिक परेशानी बढ़ा रही है.
क्षेत्र में कृषि संकट का एक और गंभीर पहलू किसान आत्महत्या के आंकड़ों में सामने आया है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जनवरी से अगस्त 2026 के बीच मराठवाड़ा में 653 किसानों ने आत्महत्या की. इनमें बीड में सबसे अधिक 149 मामले दर्ज किए गए थे.
हालांकि, इस रिपोर्ट में उद्धृत बाद के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से सितंबर 2026 के बीच बीड में यह संख्या 168 बताई गई है. पिछले आठ दिनों में हिंगोली और लातूर में एक-एक और बीड में तीन किसान आत्महत्या के मामले सामने आने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है.
महाराष्ट्र में कुल बारिश की कमी करीब 18 फीसदी है. यह आंकड़ा व्यापक स्तर पर सामान्य बारिश की श्रेणी के करीब है, लेकिन जिलों में बारिश के वितरण और लंबे सूखे अंतराल ने अलग तस्वीर पेश की है. मराठवाड़ा के कई हिस्सों में बारिश का लंबा ब्रेक खरीफ फसलों के लिए नुकसानदायक रहा है. पानी के स्रोतों के कमजोर होने से पशुपालन और घरेलू जल आपूर्ति पर भी दबाव बढ़ा है.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लातूर और धाराशिव की स्थिति को बेहद गंभीर बताया है. उन्होंने कहा है कि किसानों को राहत देने के लिए राज्य सरकार केंद्रीय फंड का इंतजार नहीं करेगी. मुख्यमंत्री के मुताबिक सरकार पेयजल और चारे की व्यवस्था कर रही है और कर्जमाफी योजना भी जारी रहेगी.
सूखा घोषित होने के बाद धाराशिव और मराठवाड़ा के किसानों की नजर अब फसल नुकसान के पंचनामे, आकलन और राहत के वितरण पर है. किसानों की मांग है कि पिछले साल की लंबित सहायता का भुगतान किया जाए और इस साल हुए नुकसान का आकलन जल्द पूरा कर सहायता दी जाए. सूखा घोषणा के बाद अब राहत उपायों का जमीन पर लागू होना अहम है. किसानों के लिए समय पर आर्थिक सहायता, घरों के लिए पानी और पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता तत्काल जरूरत बनी हुई है.
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