हिमाचल प्रदेश में इसलिए हो रही गेहूं खरीद में देरी. (सांकेतिक फोटो)हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला स्थित रियाली, मिलवान और फतेहपुर मंडी में गेहूं खरीद में 2 हफ्ते की देरी हो गई है. इन तीन क्रय केंद्रों पर अभी तक गेहूं खरीद शुरू नहीं हुई है. हालांकि, आधिकारिक तौर पर राज्य खाद्य और नागरिक आपूर्ति निगम (एफसीएससी) के माध्यम से गेहूं खरीद प्रक्रिया 10 अप्रैल को शुरू हुई थी. बेमौसम बारिश और खराब मौसम की वजह से गेहूं की कटाई बाधित हुई, जिससे खरीद प्रक्रिया में देरी हुई है.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य कृषि विभाग ने एएमपीसी के माध्यम से पहली बार जिले के नगरोटा बगवां में चौथा खरीद केंद्र अधिसूचित किया है, जहां शुक्रवार तक कोई भी किसान फसल बेचने नहीं आया था. वहीं, फ़तेहपुर उपखंड के रियाली केंद्र पर 20 अप्रैल को खरीद शुरू हुई और कल तक 119 किसानों ने 6,549 क्विंटल गेहूं एसएफएससी के माध्यम से बेचा था. इंदौरा उपमंडल के मिलवान केंद्र में 25 अप्रैल को खरीद शुरू हुई और आठ किसानों ने 399 क्विंटल गेहूं बेचा था, जबकि फतेहपुर में दो किसानों ने कल शाम तक 27.5 क्विंटल गेहूं बेचा था.
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एचपीएफसीएससी ने इस वर्ष रियाली में 1,500 मीट्रिक टन (एमटी), मिलवान में 1,200 मीट्रिक टन और फतेहपुर में 1,000 मीट्रिक टन और नगरोटा बगवां में 300 मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य तय किया है. गेहूं की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,275 रुपये प्रति क्विंटल पर की जा रही है और सरकारी अधिसूचना के अनुसार, खरीद 10 जून तक जारी रहेगी. आधिकारिक सूत्रों से पता चला कि एचपीएफसीएससी ने पिछले साल राज्य भर में नौ खरीद केंद्रों के माध्यम से 18,500 मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा था.
वहीं, इस वर्ष, सर्दियों में शुष्क मौसम और पिछले वर्ष के लक्ष्य को प्राप्त करने में विफलता को देखते हुए लक्ष्य को संशोधित कर 10,000 मीट्रिक टन कर दिया गया है. जबकि तीन खरीद केंद्र चालू हैं और पिछले कई वर्षों से फ़तेहपुर और इंदौरा उपमंडलों में किसानों के दरवाजे पर गेहूं और धान की खरीद कर रहे हैं. अधिकांश किसान, विशेष रूप से 'मंड' क्षेत्र से, अपनी उपज पड़ोसी पंजाब में निजी खिलाड़ियों को बेचना पसंद करते हैं. पूछताछ से पता चला है कि जिन किसानों को सरकारी नोडल एजेंसी को अपनी उपज बेचने से पहले कृषि विभाग के पोर्टल पर अपना पंजीकरण कराना होता है और टोकन प्राप्त करना होता है, उन्हें यह प्रक्रिया लंबी और जटिल लगती है.
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कुछ किसानों का कहना है कि वे नोडल एजेंसी को अपनी उपज बेचने के लिए स्लॉट बुक करने में समय और ऊर्जा बर्बाद नहीं करना चाहते हैं. एक किसान ने दावा किया कि हम अपनी उपज पंजाब में निजी व्यापारियों को बेचते थे जो हमें एमएसपी से अधिक भुगतान करते थे और हमें अनाज में नमी की समस्या का भी सामना नहीं करना पड़ता था.एचपीएफसीएससी, धर्मशाला के क्षेत्र प्रबंधक स्वर्ण सिंह ने कहा कि इस वर्ष खरीद लक्ष्य हासिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं.
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