इस गौशाला में गायों की कुंडली बनाई जाती हैडेयरी और पशुपालन में गिर गाय की डिमांड बढ़ रही है. बाजार में गिर के दूध से बने घी के मुंह मांगे दाम मिल रहे हैं. यही वजह है कि सबसे ज्यादा रिसर्च भी गिर गाय को लेकर ही हो रही है. ब्राजील की मदद से एंब्रीयो ट्रांसफर किए जा रहे हैं. गिर गाय की संख्या बढ़ाने के लिए आर्टिफिशल इंसेमीनेशन (एआई) का इस्तेमाल भी किया जा रहा है. राजस्थान सरकार भी किसानों की इनकम डबल करने के लिए राज्य में गिर गाय की संख्या बढ़ाने पर काम कर रही है. और राज्य सरकार की इस योजना में उसकी मदद कर रहा है केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI), अविकानगर, राजस्थान और केंद्रीय गौवंश अनुसन्धान संस्थान, मेरठ, यूपी.
राज्य सरकार ने इसके लिए दोनों ही बड़े संस्थानों के साथ एक एमओयू भी साइन किया है. साल साल 2020-21 में जारी हुई केन्द्र सरकार की एक रिपोर्ट के आंकड़ों पर जाएं तो देश में इस वक्त प्योर गिर नस्ल की गायों की संख्या 23 लाख से ज्यादा है. जबकि गिर गाय की कुल संख्या 70 लाख के आसपास है. गिर के दूध और दूध से बने घी की डिमांड को देखते हुए ही इसकी संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.
CSWRI के डायरेक्टर अरुण कुमर तोमर ने किसान तक को बताया कि हमारे संस्थान की इस पहल से किसानों को दोहरा फायदा होगा. एक तो यह कि गिर गाय से अच्छा और ज्यादा दूध मिलेगा. बाजार में गिर गाय के दूध से बने घी की भी बहुत डिमांड है. इससे अच्छी इनकम होगी. इतना ही नहीं गिर गाय से मिलने वाली बछिया भी एक खास उम्र की होने पर बाजार में बेची जा सकेगी. आज बाजार में बछिया की भी अच्छी खासी डिमांड है.
डायरेक्टर अरुण कुमार तोमर ने बताया कि मेरठ से हमारे संस्थान में गिर सांड के सीमन की स्ट्रा आएंगी. हम अपनी लैब में उन्हें अच्छी तरह से स्टोर करेंगे. अभी योजना के शुरुआत में इसका फायदा टोंक जिले के किसानों को मिलेगा. हालांकि टोंक के वो ही किसान इसका फायदा उठा पाएंगे जिनके पास पहले से गिर गाय है. ऐसे किसानों को सीमन की स्ट्रा दी जाएगी. इससे किसान अपने यहां गिर गायों की संख्या बढ़ा सकेंगे. इसके बाद राजस्थान के सभी किसान इस योजना का फायदा उठा सकेंगे. उन्हें गिर गाय को गर्भवती कराने के लिए गिर सांड की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा. साथ ही किसी अन्य नस्ल के सांड की मदद लेने से गिर गाय की नस्ल भी खराब नहीं होगी. इससे नस्ल सुधार में भी मदद मिलेगी.
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