बरसात में पशुओं में फैलती हैं खतरनाक बीमारियांभारत में जुलाई से सितंबर के दौरान भारी बारिश होती है. इस मौसम में हवा में उमस बहुत बढ़ जाती है, जिससे तापमान में भारी उतार-चढ़ाव आता है. इस बदलते मौसम का सीधा बुरा असर हमारे पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है. ज्यादा उमस के कारण पशुओं की पाचन क्रिया खराब हो जाती है और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी अंदरूनी ताकत बहुत कम हो जाती है. शरीर कमजोर होते ही दुधारू और काम करने वाले पशु जल्दी ही संक्रामक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इसके कारण हमारे पशुपालको और डेयरी किसानों को हर साल भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि अगर किसान भाई इस मौसम में पशुओं के रहने के स्थान की साफ-सफाई, समय पर टीकाकरण और उनके खान-पान पर विशेष ध्यान दें, तो नुकसान से बचा जा सकता है. सही समय पर डॉक्टर से इलाज करवा कर इस मुश्किल मौसम में भी डेयरी व्यवसाय से बहुत बढ़िया मुनाफा कमाया जा सकता है.
उपमुख्य पशुचिकित्सा अधिकारी गाजियाबाद डॉ. हरिबंश सिंह के अनुसार, बरसात में पशुओं को 'गलघोंटू' जैसी जानलेवा बीमारी का सबसे ज्यादा खतरा होता है.इस बीमारी की चपेट में आने के बाद लगभग 80 प्रतिशत से अधिक पशुओं की मौत हो जाती है. बहुत कम जानवर ही अपनी ताकत से बच पाते हैं और उनके इलाज में भी काफी पैसा खर्च होता है. इस बीमारी में पशु को अचानक तेज बुखार आता है, शरीर कांपने लगता है और वह खाना-पीना छोड़ देता है. मुंह और नाक से बहने वाला पानी दूसरी भैंसों या गायों में भी संक्रमण फैलाता है. पशु की आंखें लाल हो जाती हैं और गले से 'घर्र-घर्र' की तेज आवाज आती है. अंत में दम घुटने से पशु की मौत हो जाती है. इससे बचने के लिए पशुपालक बारिश शुरू होने से पहले यानी मई-जून में या फिर अक्टूबर-नवंबर में सरकारी मुफ्त टीका जरूर लगवाएं. अगर पहले टीका नहीं लगवा पाए हैं, तो तुरंत नजदीकी सरकारी पशु अस्पताल जाकर टीकाकरण करवाएं
बरसात के दिनों में 'खुरपका-मुंहपका' और मक्खियों से फैलने वाला 'सर्रा रोग' भीपशुओं का बड़ा नुकसान करते हैं. खुरपका-मुंहपका बीमारी में जानवर आमतौर पर मरते नहीं हैं, लेकिन वे हमेशा के लिए बेहद कमजोर हो जाते हैं. डॉ. हरिबंश सिंह ने बताया कि इसमें पशु के पैरों के खुर पक जाते हैं,उनमें कीड़े पड़ जाते हैं और मुंह में बड़े-बड़े छाले हो जाते हैं.दर्द के कारण पशु कुछ खा नहीं पाता और उसका दूध उत्पादन आधा रह जाता है. इससे बचाव के लिए समय पर वैक्सीन लगवाना और पैरों को लाल दवा यानि पोटेशियम परमैगनेट या फिनाइल के पानी से धोना जरूरी है. यह दवा सरकारी अस्पतालों में मिलती है और इसका टीका साल में दो बार मुफ्त लगता है.दूसरी तरफ 'सर्रा रोग' एक साइलेंट किलर है जो एक खास मक्खी के काटने से फैलता है. यह कीटाणु खून में ग्लूकोज खत्म कर देते हैं,जिससे पशु अंधा होकर गोल चक्कर काटने लगता है. इससे बचाव के लिए पशुशाला के आसपास कीटनाशक छिड़कें और सफाई रखें.
ड़ॉ सिंह ने बताया कि बरसात के मौसम में गाय-भैंसों पर किलनी, चिचड़े और जूं जैसे बाहरी परजीवियों का हमला बढ़ जाता है. ये जीव पशु का खून चूसकर उसे कमजोर कर देते हैं और बीमारियां फैलाते हैं. इनसे बचाव के लिए पशुओं और उनके बाड़े की नियमित सफाई करें. किलनी दिखने पर डॉक्टर की सलाह से दवा लगाएं और ध्यान रखें कि दवा लगाने के 24 घंटे बाद ही पशु को नहलाएं ताकि दवा का पूरा असर हो सके. दूसरी ओर, पेट के कीड़े बछड़ों और बड़े पशुओं दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं छोटे बछड़ों में इससे मौत का खतरा रहता है और बड़े पशुओं का दूध घट जाता है. डॉक्टर की सलाह से नवजात बछड़ों को पैदा होने के 15 दिनों के भीतर और बड़े जानवरों को साल में तीन बार य़ानि हर चार महीने पर पेट के कीड़े मारने की दवा जरूर दें.ये दवाइयां सरकारी पशु चिकित्सालयों में बहुत कम कीमत पर मिल जाती हैं, जिन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के कभी न दें.
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