सीआईआरजी में बकरी के बच्चों की मृत्यु दर को कंट्रोल करने के लिए लगातार काम चल रहा है. फोटो क्रेडिट-किसान तक फरवरी और मार्च में बकरियां खूब बच्चे देती हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि इन्हीं दो महीने में क्यों ज्यादा देती हैं. तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि न सिर्फ फरवरी-मार्च बल्कि अक्टूबर-नवंबर में भी बकरियां खूब बच्चे देती हैं. और ऐसा इसलिए होता है कि बकरी पालक हीट में आने पर बकरियों को उसी हिसाब से गाभिन कराते हैं कि जिससे वो फरवरी-मार्च और अक्टूबर-नवंबर में ही बच्चें दें. ऐसा इसलिए प्लान किया जाता है, क्योंकि ये वो महीने हैं जब न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ज्यादा सर्दी. इसीलिए इस वक्त बड़ा जरूरी है कि बकरी जो बच्चे दे तो उनकी खास देखभाल की जाए. क्योंकि पशुपालन में री-प्रोडक्शन यानि प्रजनन बहुत मायने रखता है.
पशु उत्पादन से मुनाफा 100 रुपये का हो या फिर एक हजार का, वो सब इसी पर निर्भर करता है. बकरी पालन मीट और दूध दोनों के लिए किया जाता है. लेकिन दोनों में ही मुनाफे के लिए ये जरूरी है कि बकरी साल में दो बार जो दो-दो बच्चे देती है वो जिंदा रहें. क्योंकि खासतौर पर मीट के लिए छह-छह महीने की उम्र वाले बच्चों के अच्छे दाम मिलना शुरू हो जाते हैं. वहीं एक साल का होने पर बच्चे देने के साथ ही दूध के लिए तैयार हो जाते हैं.
गोट एक्सपर्ट का कहना है कि बकरी के बच्चों की मृत्यु् दर कम करने के लिए ये जरूरी है कि हम उसकी देखभाल के साथ ही उसके खानपान का भी ध्यान रखें. उम्र के साथ उसका वैक्सीनेशन भी कराएं.
बच्चे के पैदा होते ही उसे मां का दूध पिलाएं.
बच्चे के वजन के हिसाब से ही उसे दूध पिलाएं.
वजन एक किलो हो तो 100-125 ग्राम दूध पिलाएं.
बच्चे को दिनभर में तीन से चार बार में दूध पिलाएं.
दूध पिलाने के लिए बकरी की जैर गिरने का इंतजार ना करें.
बच्चा 18 से 20 दिन का हो तो चारे की कोपल खिलाएं.
बच्चा एक महीने का हो जाए तो पिसा हुआ दाना खिलाएं.
अगर आप साइंटीफिक तरीके से बकरी पालन कर रहे हैं तो फिर बकरी अपने शेड में अक्टूबर-नवंबर में बच्चा देगी या फिर मार्च-अप्रैल में. ये मौसम का वो वक्त है जब ना तो ज्यादा गर्मी होती है और ना ही ज्यादा सर्दी. बावजूद इसके बकरी के बच्चे को उचित देखभाल की जरूरत होती है.
बच्चे को मौसम से बचाने के लिए जरूरी उपाय पहले से ही कर लें.
जमीन पर बिछावन के लिए पुआल का इस्तेमाल करें.
तीन महीने का होने पर बच्चे का टीकाकरण शुरू करा दें.
डॉक्टर की सलाह पर पेट के कीड़ों की दवाई दें.
जन्म से एक-डेढ़ महीने पहले बकरी की खुराक बढ़ा दें.
बकरी को भरपूर मात्रा में हरा, सूखा चारा और दाना खाने को दें.
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