महाराष्ट्र के मछुआरों की बढ़ेगी कमाई, मसल-ऑयस्टर की खेती को मिलेगा बढ़ावा

महाराष्ट्र के मछुआरों की बढ़ेगी कमाई, मसल-ऑयस्टर की खेती को मिलेगा बढ़ावा

महाराष्ट्र के तटीय इलाकों में मछुआरों और आदिवासी समुदायों की कमाई बढ़ाने के लिए नई पहल की गई है. ICAR-CMFRI ने ग्रीन मसल के 10 लाख और ऑयस्टर के 1 लाख बीज उपलब्ध कराए हैं. साथ ही, 30 अधिकारियों को इनकी खेती की तकनीक का प्रशिक्षण दिया गया है.

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महाराष्ट्र के मछुआरों की बढ़ेगी कमाई, मसल-ऑयस्टर की खेती को मिलेगा बढ़ावाऑयस्टर की खेती (AI- Image)

महाराष्ट्र के तटीय इलाकों में रहने वाले मछुआरों और आदिवासी समुदायों की कमाई बढ़ाने के लिए नई पहल की गई है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (ICAR-CMFRI) ने राज्य में ग्रीन मसल के 5 लाख बीज और उपलब्ध कराए हैं. इसके साथ ही पिछले छह महीनों में बांटे गए ग्रीन मसल के बीजों की कुल संख्या 10 लाख हो गई है. इसके अलावा, ऑयस्टर की खेती को बढ़ावा देने के लिए 1 लाख बीज भी महाराष्ट्र भेजे गए हैं. इस पहल का मकसद तटीय इलाकों में मसल और ऑयस्टर की खेती को बढ़ावा देना है, ताकि स्थानीय लोगों को कम लागत में आजीविका का नया साधन मिल सके. संस्थान के मुताबिक, यह काम प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत किया जा रहा है.

क्या है मसल और ऑयस्टर की खेती?

मसल और ऑयस्टर समुद्र में पाए जाने वाले ऐसे जीव हैं, जिन्हें खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ये बाइवाल्व यानी दो खोल वाले जलीय जीवों की श्रेणी में आते हैं. इनकी खेती समुद्र के अनुकूल तटीय क्षेत्रों में की जा सकती है. CMFRI के अनुसार, ग्रीन मसल के 2 से 4 मिलीमीटर आकार के बीज केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित विझिनजाम क्षेत्रीय केंद्र की हैचरी में तैयार किए गए हैं. वहीं, ऑयस्टर के बीज संस्थान के मद्रास क्षेत्रीय केंद्र में तैयार किए गए हैं.

30 अधिकारियों को दिया गया प्रशिक्षण

मसल और ऑयस्टर की खेती को बढ़ावा देने के लिए CMFRI की टीम ने महाराष्ट्र के मैंग्रोव सेल के 30 अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया है. इस टीम का नेतृत्व संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक एम.के. अनिल ने किया. प्रशिक्षण में अधिकारियों को मसल और ऑयस्टर की नर्सरी तैयार करने और उनकी खेती करने की तकनीक बताई गई. अब ये अधिकारी स्थानीय मछुआरों और आदिवासी समुदायों तक खेती से जुड़ी जानकारी और तकनीक पहुंचाएंगे. महाराष्ट्र का मैंग्रोव एंड मरीन बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन फाउंडेशन भी इस काम में सहयोग कर रहा है. यह संस्था बीजों की आपूर्ति, तकनीकी मार्गदर्शन और स्थानीय लोगों की भागीदारी के बीच तालमेल बनाने का काम कर रही है.

कम लागत में कमाई का नया जरिया

CMFRI के निदेशक ग्रिनसन जॉर्ज के मुताबिक, मसल और ऑयस्टर की खेती में निवेश और रोजाना के संचालन की लागत कम हो सकती है. सही जगह और अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में इनकी खेती के लिए बाहरी संसाधनों की जरूरत भी अपेक्षाकृत कम पड़ती है. इससे तटीय इलाकों के लोगों को रोजगार और कमाई का एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकता है. हालांकि, वास्तविक कमाई खेती के क्षेत्र, उत्पादन, बाजार और बिक्री की कीमत पर निर्भर करेगी.

पर्यावरण को भी मिल सकता है फायदा

मसल और ऑयस्टर को पानी से भोजन के कण छानकर लेने वाले जीव यानी फिल्टर फीडर कहा जाता है. CMFRI के अनुसार, अनुकूल परिस्थितियों में इनकी खेती पानी की क्वालिटी सुधारने में मदद कर सकती है. संस्थान का मानना है कि मसल और ऑयस्टर की खेती को मैंग्रोव वनों के संरक्षण और पुनरुद्धार के साथ जोड़ने से आजीविका बढ़ाने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्रोत्साहन मिल सकता है. (PTI)

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