किसान कारवां 2.0किसानों की समस्याओं को समझने, उन्हें कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से सीधे जोड़ने और खेती को अधिक लाभकारी बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया किसान कारवां 2.0 उत्तर प्रदेश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में किसानों तक पहुंच रहा है. इसी कड़ी में 24 अक्टूबर को झांसी स्थित रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के सभागार में पांचवीं क्षेत्रीय किसान महासभा का आयोजन किया गया. इसमें बुंदेलखंड की कृषि को नई दिशा देने, कम पानी में बेहतर उत्पादन, दलहन-तिलहन की खेती, पान उत्पादन, कृषि उत्पादों के वैल्यू एडिशन, औषधीय खेती, मछली पालन और गौपालन से किसानों की आय बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई.
महासभा में कृषि वैज्ञानिकों, विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों, अधिकारियों, प्रगतिशील किसानों और कृषि उद्यमियों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत किस्मों और बाजार की संभावनाओं से अवगत कराने के साथ उन्हें अपनी समस्याएं और सफल प्रयोग साझा करने का मंच उपलब्ध कराना रहा.
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. ए.के. सिंह ने दीप प्रज्वलित कर महासभा का शुभारंभ किया. कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, वैज्ञानिक खेती और कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण को बढ़ावा देकर किसानों की आमदनी में सुधार किया जा सकता है.
महासभा में बुंदेलखंड में कृषि के बदलते स्वरूप और किसानों के सामने मौजूद चुनौतियों पर विशेष चर्चा हुई. कुलपति डॉ. ए.के. सिंह ने कहा कि खेत तालाब योजना ने बुंदेलखंड में खेती की परिस्थितियों को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जल संरक्षण के प्रयासों से किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने और खेती की संभावनाओं को बढ़ाने में मदद मिली है.
उन्होंने विश्वविद्यालय में जल संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए बताया कि परिसर में लगभग 22 एकड़ क्षेत्र में तालाब का निर्माण कराया गया है. इन तालाबों की मदद से विश्वविद्यालय के करीब 300 एकड़ फार्म क्षेत्र में खेती को सहारा मिलता है. डॉ. सिंह ने बुंदेलखंड में मूंगफली की खेती के बढ़ते रुझान को भी महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि क्षेत्र की कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखकर फसलों का चयन करना और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करना किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है.
महासभा में इस बात पर भी जोर दिया गया कि बुंदेलखंड में खेती को टिकाऊ और मुनाफे का व्यवसाय बनाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. इसके साथ जल प्रबंधन, उपयुक्त फसल किस्मों, वैज्ञानिक सलाह और कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन पर भी ध्यान देना जरूरी है.
किसान महासभा के प्रमुख सत्रों में शामिल ‘बदलता बुंदेलखंड’ पैनल चर्चा का संचालन किसान तक के संपादक ओमप्रकाश ने किया. इसमें रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के डीन हॉर्टिकल्चर डॉ. मनीष श्रीवास्तव, डीन फिशरीज डॉ. पी.के. पांडे, डीन वेटेरिनरी डॉ. आर.पी. सिंह और महोबा की प्रगतिशील किसान और उद्यमी मयंकिता चौरसिया ने अपने विचार साझा किए.
चर्चा में बुंदेलखंड में खेती के तौर-तरीकों में आ रहे बदलाव, उन्नत किस्मों के इस्तेमाल, वैज्ञानिक तकनीकों और कृषि से जुड़े दूसरे व्यवसायों की संभावनाओं पर जोर दिया गया. विशेषज्ञों ने कहा कि किसानों को उनकी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बेहतर बीज, आधुनिक उत्पादन तकनीक और समय पर वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराना जरूरी है.
डॉ. मनीष श्रीवास्तव ने बुंदेलखंड में बागवानी और कृषि विविधीकरण की संभावनाओं पर चर्चा की. उन्होंने बताया कि स्थानीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप फसलों का चयन किसानों के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है. बागवानी आधारित खेती को बेहतर तकनीक और उचित प्रबंधन के साथ अपनाकर किसान अपनी आय के स्रोत बढ़ा सकते हैं.
डॉ. पी.के. पांडे ने क्षेत्र में मछली पालन की संभावनाओं और किसानों के बढ़ते रुझान पर अपने विचार रखे. कृषि के साथ मछली पालन जैसी गतिविधियों को जोड़ने से किसानों को आय के अतिरिक्त स्रोत मिल सकते हैं. खासकर जहां पानी की उपलब्धता और उपयुक्त संसाधन मौजूद हों, वहां वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ मत्स्य पालन को आजीविका का बेहतर विकल्प बनाया जा सकता है.
महासभा में महोबा की युवा महिला उद्यमी मयंकिता चौरसिया का अनुभव भी चर्चा का अहम हिस्सा रहा. उन्होंने परिवार की पान की खेती से जुड़े अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि पान और उससे संबंधित उत्पादों में वैल्यू एडिशन के जरिए व्यवसाय के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं. मयंकिता ने पान उत्पादन से आगे बढ़कर उससे जुड़े उत्पादों को व्यावसायिक रूप देने की दिशा में काम किया है. उनकी पहल यह बताती है कि पारंपरिक फसलों को भी बेहतर प्रसंस्करण, उत्पाद विकास और बाजार से जोड़कर किसानों के लिए आय के नए रास्ते खोले जा सकते हैं.
महासभा में इस तरह के उदाहरणों को महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि कृषि उत्पादों का वैल्यू एडिशन किसानों को केवल कच्चा उत्पाद बेचने तक सीमित रहने के बजाय कारोबार के अगले चरणों से जुड़ने का अवसर देता है.
दलहन और तिलहन की खेती को बढ़ावा देना भी महासभा के प्रमुख विषयों में शामिल रहा. रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार डॉ. सुशील कुमार सिंह ने किसानों को दलहन-तिलहन की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव दिए. उन्होंने उत्पादन बढ़ाने के लिए उपयुक्त किस्मों के चयन, बेहतर कृषि प्रबंधन और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने के महत्व पर प्रकाश डाला. दलहन और तिलहन की उत्पादकता में सुधार के लिए किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज, नई तकनीक और कृषि विशेषज्ञों की सलाह पहुंचाना जरूरी है.
महासभा में यह भी चर्चा हुई कि फसल विविधीकरण के जरिए किसान अपनी जमीन, पानी और स्थानीय परिस्थितियों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं. दलहन-तिलहन की खेती को बढ़ावा देने से कृषि उत्पादन के साथ किसानों की बाजार संबंधी संभावनाओं को भी मजबूती मिल सकती है.
बुंदेलखंड में पानी की उपलब्धता खेती की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है. इसी को ध्यान में रखते हुए किसान महासभा में ‘कम पानी में दम दिखाने वाली फसलें’ विषय पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया. इसका संचालन किसान तक के वरिष्ठ संवाददाता जेपी सिंह ने किया. इस सत्र में रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक अनुसंधान डॉ. एस.के. चतुर्वेदी, निदेशक शिक्षा डॉ. अनिल कुमार, डीन एग्रीकल्चर डॉ. आर.के. सिंह और प्रगतिशील किसान पुष्पेंद्र यादव ने हिस्सा लिया.
चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि बुंदेलखंड की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसी फसलों और किस्मों पर काम किया जा रहा है, जो सीमित पानी में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती हैं. किसानों के लिए ऐसी फसलों का चयन महत्वपूर्ण है, जिनकी पानी की जरूरत कम हो और जिनसे स्थानीय परिस्थितियों में बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सके.
डॉ. एस.के. चतुर्वेदी ने क्षेत्र के लिए विकसित की जा रही और उपयुक्त पाई गई नई किस्मों और अनुसंधान के महत्व पर प्रकाश डाला. वहीं, डॉ. आर.के. सिंह ने कम पानी की स्थिति में खेती को बेहतर बनाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी. विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि कम पानी वाले क्षेत्रों में खेती की सफलता के लिए फसल चयन के साथ मिट्टी की नमी का संरक्षण, सिंचाई का बेहतर प्रबंधन और कृषि तकनीकों का सही इस्तेमाल भी जरूरी है.
इस सत्र में झांसी के प्रगतिशील किसान और एफपीओ संचालक पुष्पेंद्र यादव ने औषधीय खेती के अपने अनुभव साझा किए. उन्होंने बताया कि तुलसी जैसी औषधीय फसल की खेती के साथ उसकी प्रोसेसिंग पर ध्यान देकर किसानों के लिए बेहतर कमाई के अवसर तैयार किए जा सकते हैं.
कृषि उत्पादों को सीधे बाजार में बेचने के अलावा उनकी प्रोसेसिंग और मूल्यवर्धन से जुड़ना किसानों को कारोबार के अधिक अवसर दे सकता है. पुष्पेंद्र यादव का अनुभव इस बात को रेखांकित करता है कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और बाजार की जरूरतों को समझना भी आवश्यक है. महासभा में औषधीय फसलों को फसल विविधीकरण के एक संभावित विकल्प के रूप में देखा गया. हालांकि, ऐसी खेती शुरू करने से पहले बाजार की मांग, खरीदारों की उपलब्धता और प्रसंस्करण की व्यवस्था को समझना भी जरूरी है.
किसान कारवां 2.0 के दौरान कृषि परिषद के गठन की पहल पर भी चर्चा की गई. इस पहल का उद्देश्य कृषि अधिकारियों, वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों को एक मंच पर लाकर किसानों और सरकार के बीच संवाद को मजबूत करना है. किसानों को खेती के दौरान बीज, सिंचाई, फसल सुरक्षा, उत्पादन लागत, उपज के उचित मूल्य और सरकारी योजनाओं से जुड़ी कई व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कई बार स्थानीय स्तर पर सामने आने वाली चुनौतियों और किसानों के अनुभवों को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी मंच की जरूरत होती है.
कृषि परिषद के माध्यम से किसानों की जमीनी समस्याओं, खेती में आने वाली चुनौतियों और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े अनुभवों को संबंधित विभागों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। इससे कृषि योजनाओं को किसानों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप बनाने और समस्याओं के समाधान के लिए बेहतर संवाद स्थापित करने का अवसर मिलेगा. इस पहल का व्यापक उद्देश्य किसानों की आवाज को संबंधित मंचों तक पहुंचाना, वैज्ञानिकों और किसानों के बीच संवाद बढ़ाना और कृषि क्षेत्र में नीतियों और योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए फीडबैक उपलब्ध कराना है.
किसान कारवां 2.0 के तहत कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले किसानों को पहचान देने के लिए ‘कृषि वीर’ सम्मान की पहल की गई है. इसका उद्देश्य उन किसानों के अनुभवों को सामने लाना है, जिन्होंने खेती में नवाचार, फसल विविधीकरण, उद्यमिता, वैल्यू एडिशन, जैविक एवं प्राकृतिक खेती और डेयरी जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रयास किए हैं.
झांसी में आयोजित किसान महासभा के दौरान विभिन्न जिलों के 10 किसानों को सम्मानित किया गया. रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. ए.के. सिंह ने चयनित किसानों को प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किए. सम्मानित किसानों के कार्य दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं. मिलेट उत्पादन से लेकर औषधीय खेती, कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण और डेयरी तक, खेती से जुड़े अलग-अलग क्षेत्रों में किए जा रहे प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की संभावनाएं दिखाते हैं.
1. पुष्पेंद्र सिंह यादव — झांसी
2. दीप नारायण पांडे — चित्रकूट
3. अशोक कुमार सिंह — जालौन
4. आलोक सिंह — बांदा
5. राजकुमार चौरसिया — महोबा
6. डॉ. ध्वजपाल सिंह — महोबा
7. राजकुमार पांडे — हमीरपुर
8. मिथुन राजपूत — हमीरपुर
9. कोमल प्रसाद अहिरवार — ललितपुर
10. तान्या बंसल — झांसी
कृषि वीरों को सम्मानित करने की पहल का उद्देश्य सफल किसानों के अनुभवों को व्यापक स्तर पर पहुंचाना है, ताकि अन्य किसान भी नई तकनीकों को अपनाने, फसल विविधीकरण करने और कृषि उत्पादों में वैल्यू एडिशन की संभावनाओं को समझ सकें.
किसान महासभा में खेती से जुड़े गंभीर विषयों पर चर्चा के साथ किसानों के मनोरंजन का भी ध्यान रखा गया. कार्यक्रम के दौरान सीतापुर के जादूगर सलमान ने जादू के विभिन्न करतब दिखाकर उपस्थित किसानों का मनोरंजन किया. इस तरह के आयोजन का उद्देश्य किसानों को विशेषज्ञों से संवाद का अवसर देने के साथ कार्यक्रम को सहभागितापूर्ण और रोचक बनाना भी है. किसान कारवां 2.0 के मंच पर तकनीकी चर्चाओं, किसानों के अनुभवों और सम्मान समारोह के जरिए कृषि से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को एक साथ प्रस्तुत किया जा रहा है.
किसान कारवां 2.0 का अगला पड़ाव वाराणसी होगा. कार्यक्रम के अनुसार, 30 अक्टूबर को पूर्वांचल के किसानों के लिए अगली क्षेत्रीय किसान महासभा आयोजित की जाएगी, जिसमें मिर्जापुर, सोनभद्र और प्रयागराज क्षेत्र के किसानों की भागीदारी प्रस्तावित है. इस महासभा में क्षेत्र की कृषि परिस्थितियों और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए खेती की चुनौतियों, फसल विविधीकरण, आधुनिक कृषि तकनीकों और किसानों की आय बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की जाएगी. इसमें किसान, कृषि वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, अधिकारी और प्रगतिशील किसान अपने अनुभव और सुझाव साझा करेंगे.
किसान कारवां 2.0 के तहत उत्तर प्रदेश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में आयोजित की जा रही क्षेत्रीय किसान महासभाओं का उद्देश्य स्थानीय जरूरतों के अनुसार खेती से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करना, किसानों को विशेषज्ञों से जोड़ना और कृषि क्षेत्र में उपलब्ध नए अवसरों की जानकारी देना है. झांसी की महासभा में जल संरक्षण, कम पानी में खेती, दलहन-तिलहन उत्पादन, औषधीय फसलों, पान आधारित उद्यमिता और कृषि उत्पादों के वैल्यू एडिशन पर हुई चर्चा ने यह संदेश दिया कि बुंदेलखंड में खेती को अधिक लाभकारी बनाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय अनुभव और बाजार से जुड़ाव को साथ लेकर चलना होगा.
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