FMD: गाय-भैंस के बछड़ों को नहीं होगी खुरपका-मुंहपका बीमारी, ये हैं बचाव के टिप्स 

FMD: गाय-भैंस के बछड़ों को नहीं होगी खुरपका-मुंहपका बीमारी, ये हैं बचाव के टिप्स 

थोड़ी सी देखभाल से बछड़ों को खुरपका-मुंहपका (FMD)  जैसी बीमारी से बचाया जा सकता है. इसके लिए करना सिर्फ ये होगा कि डाक्टर की सलाह पर शेड में कुछ खास इंतजाम करने होंगे. साथ ही बछड़ों के व्यवहार पर भी नजर रखनी होगी. जैसे ही FMD के लक्षण दिखाई दें तो फौरन ही डॉक्टर के बताए गए उपायों पर काम करना शुरू कर दें. 

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FMD: गाय-भैंस के बछड़ों को नहीं होगी खुरपका-मुंहपका बीमारी, ये हैं बचाव के टिप्स पेरियार गाय को मिला देसी नस्‍ल का दर्जा (सांकेतिक तस्‍वीर-AI Generated)

बीमारी कोई भी हो जैसे ही वो पशुओं को अपनी चपेट में लेती है तो उसका सबसे पहला असर उत्पादन पर पड़ता है. खुरपका-मुंहपका (FMD) बीमारी की बात करें तो ये और भी खतरनाक हो जाती है. क्योंकि ये वो बीमारी है जिसके चलते पशुओं की मौत तक हो जाती है. ऐसे में बड़े पशुओं को एफएमडी से बचाने के साथ-साथ बछड़ों को बीमारी से दूर रखना और ज्यादा जरूरी हो जाता है. हालांकि एनिमल एक्सपर्ट के मुताबिक एफएमडी बछड़ों पर कम ही अटैक करती है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बछड़े इसकी चपेट में ही नहीं आते हैं. 

लेकिन जब बछड़े इस बीमारी की चपेट में आते हैं तो उन्हें बहुत ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है. एफएमडी के खासतौर पर सर्दियों और बरसात में होने की आशंका ज्यादा रहती है. इसलिए बछड़ों के शेड में ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. इस बीमारी के चलते पशुओं को तो परेशानी होती ही है, साथ में पशु के इलाज पर खर्च होता है और उत्पादन घटता है तो उसका नुकसान अलग से. 

FMD से प्रभावित होता है हॉर्ट

एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि FMD अगर बछड़ों में होती है तो वो उनके हॉर्ट को भी प्रभावित करती है. ऐसा होने पर बछड़ों की मौत तक हो जाती है. इसलिए जहां भी FMD संक्रमण फैला हो या फैलने की आशंका हो तो वहां बछड़ों की खास देखभाल करनी चाहिए. अगर बछड़ों में लक्षण दिखाई दें तो बछड़ों के शेड में भी दवाई का छिड़काव जरूरी हो जाता है. संक्रमण फैलते ही तेज बुखार के साथ मुंह और पैर में छाले हो जाते हैं. ऐसे कुछ लक्षण दिखाई देने पर फौरन ही शेड में ये जरूरत काम शुरू कर देने चाहिए. 

  • शेड को 0.1 फीसद पोटेशियम परमैंगनेट के घोल से धोना चाहिए. 
  • घावों पर बोरोग्लिसरीन लगानी चाहिए. 
  • पैरों को फिनाइल के घोल से धोना चाहिए.
  • संक्रमित बछड़े को स्वस्थ बछड़ों से अलग कर दें. 
  • बछड़ों का टीकाकरण एक महीने, तीन महीने और छह महीने की उम्र में कराना चाहिए.
  • हर छह महीने पर वैक्सीनेशन कराते रहना चाहिए. 
  • पेट के कीड़े मारने के लिए पाइपरजीन देना चाहिए. 
  • पशु शेड को साफ रखने से बाहरी कीड़े अंदर नहीं आते हैं. 
  • लेमनग्रास, तुलसी और निर्गुंडी जैसे फीड को शेड में लटकाना चाहिए.

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