
भारत में अल नीनो का असर पूरी तरह दिखने लगा है. मॉनसून सीजन खराब चल रहा है और बारिश के पैटर्न में बदलाव है. जून एकदम सूखा चला गया जबकि जुलाई में बहुत अधिक बारिश हुई. इससे बारिश की कमी जरूर पूरी हुई, लेकिन उन फसलों के नुकसान की भरपाई नहीं हो सकी जो जून में कम बारिश से बोई नहीं जा सकी थीं. इस बीच मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि देश अब दूसरे सूखा चक्र में प्रवेश करने जा रहा है. इसका संकेत दिखने भी लगा है क्योंकि कई इलाकों से बारिश गायब हो गई है.
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, दक्षिण पश्चिम मॉनसून अपने ब्रेक फेज में चला गया है. जिसका असर साफ-साफ देखा जा रहा है. देश के मध्य, पश्चिमी और उत्तर पूर्वी इलाकों में अगले तीन-चार दिनों तक बारिश की गतिविधियां बंद रहेंगी. जानकारों के मुताबिक, बारिश का यह ब्रेक अल नीनो के प्रभाव के चलते है. अल नीनो से पैदा हुई गर्मी ने भारत के ऊपर बनने वाली बारिश की गतिविधि को एक तरह से रोक दिया है. भारत के ऊपर अभी बारिश का कोई सिस्टम नहीं बन पा रहा है जिससे मॉनसून अपने ब्रेक पर चला गया है.
मॉनसून के सीजन में वायुमंडल में बारिश की परिस्थितियां बनती हैं जिसमें बादल बनने से लेकर बारिश तक का पैटर्न शामिल होता है. लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. मौजूदा समय में बारिश कराने वाले तीनों सिस्टम-मेडेन जूलियन ऑसिलेशन, बोरियल समर इंटरसीजनल ऑसिलेशन और लो प्रेशर एरिया बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गायब हैं. यही वजह है कि मॉनसून ब्रेक पर चला गया है.
ये तीनों सिस्टम मॉनसून के इंजन की तरह काम करते हैं क्योंकि इनके मिलेजुले प्रयास से ही बादल बनते हैं, आंधी-तूफान आते हैं और कम दबाव का क्षेत्र बनता है. इससे हवा में नमी तैयार होती है. यही नमी मैदानी इलाकों में आती है तो बारिश होती है. मगर नमी वाली हवाएं अभी गायब हैं, इसलिए बारिश भी गायब है. ऊपर बताए गए सिस्टम के बिना, मॉनसून को ज्यादा बारिश बनाए रखने में मुश्किल होती है, जिससे कई इलाके लंबे समय तक सूखे की स्थिति में रहते हैं.
भारत के लिए, अल नीनो अक्सर मॉनसून को कमजोर कर देता है, क्योंकि यह नमी के ट्रांसपोर्ट को कम कर देता है और सबकॉन्टिनेंट पर बादल बनने को रोक देता है. इस वजह से, सिर्फ कुछ जगहों पर, खासकर नॉर्थईस्ट भारत और हिमालय की तलहटी में, भारी बारिश होने की उम्मीद है, जबकि देश का ज्यादातर हिस्सा नए मौसम सिस्टम के आने का इंतजार कर रहा है.
हालांकि, जुलाई के दूसरे आधे हिस्से के लिए थोड़ी उम्मीद है.
फोरकास्ट मॉडल बताते हैं कि मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन, रॉस्बी वेव्स और नए लो प्रेशर सिस्टम जुलाई के आखिरी सात से दस दिनों में बंगाल की खाड़ी के ऊपर एक्टिव हो सकते हैं. अगर ये सिस्टम अनुमान के मुताबिक डेवलप होते हैं, तो वे मॉनसून सर्कुलेशन में नई ऊर्जा डाल सकते हैं, जिससे बारिश वाले नए सिस्टम बनने में मदद मिलेगी जो पूर्वी, मध्य और उत्तरी भारत में अंदर की ओर बढ़ेंगे. फिर बारिश होगी.