हर बार अल नीनो से नहीं बिगड़ता मॉनसून, 16 में सिर्फ 7 बार ही कम हुई बारिश

हर बार अल नीनो से नहीं बिगड़ता मॉनसून, 16 में सिर्फ 7 बार ही कम हुई बारिश

सरकार ने कहा है कि अल नीनो का असर हर बार भारतीय मॉनसून को कमजोर नहीं करता. 1950 के बाद 16 अल नीनो घटनाओं में केवल 7 बार ही सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई. हालांकि 2026-27 के दौरान अल नीनो के बने रहने की संभावना को देखते हुए आईएमडी और अन्य एजेंसियां लगातार निगरानी कर रही हैं.

अल नीनो का खतरा बढ़ाअल नीनो का खतरा बढ़ा
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Aug 07, 2026,
  • Updated Aug 07, 2026, 2:39 PM IST

देश में अल नीनो को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि हर बार अल नीनो की स्थिति बनने का मतलब मॉनसून का कमजोर होना नहीं होता. पिछले सात दशकों के आंकड़े बताते हैं कि 1950 के बाद 16 बार अल नीनो की स्थिति बनी, लेकिन इनमें से सिर्फ 7 बार ही भारतीय मॉनसून में सामान्य से कम बारिश रिकॉर्ड की गई.

लोकसभा में एक लिखित जवाब में पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अल नीनो और मॉनसून के बीच संबंध जरूर है, लेकिन यह बारिश को प्रभावित करने वाला एकमात्र फैक्टर नहीं है. भारतीय मॉनसून पर इंडियन ओशन डायपोल (IOD), मैडेन-जूलियन ऑस्सिलेशन (MJO) और महासागर-वायुमंडल से जुड़ी परिस्थितियों जैसे कई अन्य कारणों का भी असर पड़ता है.

सितंबर की बारिश पर ज्यादा दिखता है असर

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, सामान्य तौर पर अल नीनो के दौरान मॉनसून कमजोर रहने की आशंका बढ़ जाती है और इसकी तीव्रता यह तय करती है कि बारिश पर कितना प्रभाव पड़ेगा. हालांकि पूरे मॉनसून मौसम की तुलना में सितंबर महीने की बारिश पर अल नीनो का प्रभाव अधिक स्पष्ट देखा गया है. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मॉनसून के अंतिम चरण में अल नीनो और बारिश के बीच मजबूत उलटा संबंध पाया गया है.

सामान्य से कम बारिश का अनुमान

आईएमडी ने इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के लिए सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया है. 13 अप्रैल 2026 को जारी पहले पूर्वानुमान में देशभर में मौसमी बारिश को LPA का 92 प्रतिशत बताया गया था. बाद में दूसरे स्टेज के पूर्वानुमान में इसे घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया.

मौसम विभाग ने अपने पूर्वानुमानों में यह भी संकेत दिया था कि मॉनसून सीजन के दौरान अल नीनो की स्थिति बन सकती है. इसका मकसद किसानों, पानी के सोर्स को मैनेज करने वालों और अन्य संबंधित एजेंसियों को पहले से तैयारी का अवसर देना था.

फरवरी 2027 तक बना रह सकता है अल नीनो

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) के ताजा आकलन के अनुसार मई 2026 में एक्टिव हुई अल नीनो की स्थिति जून 2026 से फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना है. इसके बने रहने की संभावना 70 से 90 प्रतिशत के बीच आंकी गई है.

कृषि और जल प्रबंधन एजेंसियां अलर्ट पर

सरकार के मुताबिक, भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) कृषि और जल संसाधन से जुड़े विभागों के साथ मिलकर लगातार काम कर रहा है. उद्देश्य यह समझना है कि अल नीनो और बदलती बारिश का खेती और जल प्रबंधन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है.

आईएमडी नियमित तौर पर मौसमी और मासिक पूर्वानुमान जारी करता है. इसके अलावा जिले और ब्लॉक स्तर तक बारिश संबंधी जानकारी साझा की जाती है. कृषि मंत्रालय की 'क्रॉप वेदर वॉच' बैठकों में भी मौसम विभाग हर सप्ताह पिछले सप्ताह की बारिश और अगले दो सप्ताह के पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है.

मछली पालन और फिशिंग पर भी असर संभव

सरकार ने माना है कि अल नीनो का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं रह सकता. इसके कारण अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के ऊपर मौसमी परिस्थितियों में बदलाव आ सकता है. समुद्री सतह के तापमान में बढ़ोतरी से समुद्री लू जैसी स्थितियां बन सकती हैं.

हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि 2026 में अल नीनो के संभावित प्रभावों को लेकर राज्यों के लिए कोई अलग जिला-वार रिस्क का अध्ययन या विशेष दिशानिर्देश जारी नहीं किए गए हैं. इसके बजाय मौसम और जलवायु से जुड़ी चेतावनियां और रेगुलर अपडेट उपलब्ध कराए जा रहे हैं, ताकि राज्य सरकारें स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फैसले ले सकें.

कुल मिलाकर सरकार का कहना है कि अल नीनो को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है, लेकिन केवल इसके आधार पर मॉनसून को कमजोर मान लेना सही नहीं होगा. आने वाले महीनों में हिंद महासागर की स्थिति, हवाओं के पैटर्न और अन्य जलवायु फैक्टर तय करेंगे कि भारतीय मॉनसून पर इसका असली असर कितना पड़ता है.

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