मौसम की चेतावनी या महंगाई की साज‍िश, अल नीनो के डर पर क‍िसान नेता ने उठाए सवाल

मौसम की चेतावनी या महंगाई की साज‍िश, अल नीनो के डर पर क‍िसान नेता ने उठाए सवाल

अल नीनो को लेकर बढ़ती आशंकाओं के बीच विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए असली खतरा मौसमीय घटना नहीं, बल्कि उसके नाम पर फैलाया जाने वाला डर है. फसल उत्पादन के वास्तविक आंकड़ों से पहले ही सूखा और कमी की आशंकाएं बाजार में महंगाई बढ़ा सकती हैं, जिसका असर किसानों, उपभोक्ताओं और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.

एमएसपी कमेटी के सदस्य ब‍िनोद आनंद एमएसपी कमेटी के सदस्य ब‍िनोद आनंद
क‍िसान तक
  • New Delhi ,
  • Jun 24, 2026,
  • Updated Jun 24, 2026, 1:40 PM IST

भारत में हर साल मॉनसून और मौसम को लेकर चर्चा होती है. जैसे ही अल नीनो (El Niño) की संभावना जताई जाती है, देश में सूखे, फसल नुकसान और खाद्य संकट की आशंकाएं भी बढ़ने लगती हैं. लेकिन कृषि और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए असली चुनौती केवल अल नीनो नहीं है, बल्कि उससे जुड़ा डर और उसके आधार पर पैदा किया जाने वाला बाजार का माहौल भी है.

भारत सरकार की एमएसपी और कृषि सुधार संबंधी उच्चाधिकार समिति के सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि मौसम संबंधी जोखिम हमेशा से रहे हैं और भविष्य में भी रहेंगे. लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब संभावित मौसमीय घटनाओं को वास्तविक स्थिति से पहले ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. इससे बाजार में अनावश्यक भय पैदा होता है और इसका असर सीधे खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दिखाई देता है.

डर का असर बाजार पर कैसे पड़ता है?

क‍िसान नेता ब‍िनोद आनंद का कहना है क‍ि जब फसल उत्पादन के वास्तविक आंकड़े आने से पहले ही सूखे या उत्पादन में भारी गिरावट की खबरें फैलने लगती हैं, तो बाजार में कीमतों को लेकर अटकलें शुरू हो जाती हैं. व्यापारी, आयातक और निवेशक भविष्य की संभावित कमी को ध्यान में रखकर अपने फैसले लेने लगते हैं.

भारत खाद्य तेलों और कुछ दालों के मामले में अभी भी आयात पर काफी हद तक निर्भर है. ऐसे में यदि यह धारणा बन जाए कि आने वाले महीनों में उत्पादन घट सकता है, तो अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों बाजारों में कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है. कई बार वास्तविक कमी आने से पहले ही उपभोक्ताओं को महंगे दाम चुकाने पड़ते हैं.

किसानों और उपभोक्ताओं पर पड़ता है सीधा असर

बाजार में डर का माहौल बनने का सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों और किसानों को उठाना पड़ता है. उपभोक्ताओं को दाल, तेल और अन्य जरूरी खाद्य पदार्थों के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ती है. दूसरी ओर किसानों को भी इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता.

कई बार कीमतों में बढ़ोतरी का फायदा उन लोगों को मिलता है जिन्होंने पहले से बाजार में अपनी स्थिति बना रखी होती है. जबकि किसान उत्पादन लागत, मौसम की अनिश्चितता और बाजार जोखिमों से जूझते रहते हैं. इस तरह महंगाई का बोझ आम जनता और देश की अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ता है.

भारत की कृषि पहले से ज्यादा मजबूत

पिछले दो दशकों में भारत की कृषि व्यवस्था काफी मजबूत हुई है. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ है, बेहतर बीज उपलब्ध हुए हैं और मौसम पूर्वानुमान की तकनीक में सुधार आया है. सरकार भी फसल बीमा, कृषि सलाह और आपदा राहत जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों की मदद कर रही है.

यही कारण है कि केवल मौसम के शुरुआती संकेतों के आधार पर बड़े संकट की तस्वीर पेश करना हमेशा सही नहीं माना जाता. कई बार मॉनसून के शुरुआती चरण में कमी दिखाई देती है, लेकिन बाद के महीनों में बारिश की भरपाई हो जाती है और फसल उत्पादन सामान्य रहता है.

नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और नीति-निर्माताओं को केवल मौसम की निगरानी तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें उन आर्थिक और बाजार तंत्रों पर भी नजर रखनी होगी जो आशंकाओं को अवसर में बदलकर मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं.

खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए समय पर आयात नीति, पर्याप्त बफर स्टॉक, बाजार निगरानी और जमाखोरी पर नियंत्रण जैसे कदम जरूरी हैं. इससे कृत्रिम कमी और अनावश्यक मूल्य वृद्धि को रोका जा सकता है.

संतुलित जानकारी ही है सबसे बड़ा समाधान

मौसम विज्ञान का उद्देश्य लोगों को संभावित जोखिमों के प्रति सतर्क करना है, न कि डर पैदा करना. इसलिए जरूरी है कि मौसम से जुड़ी जानकारी वैज्ञानिक तथ्यों और वास्तविक आंकड़ों के आधार पर लोगों तक पहुंचे. यदि मौसम पूर्वानुमानों को सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत किया जाएगा, तो इसका असर बाजार और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है.

भारत को मौसमीय चुनौतियों के लिए तैयार रहने की जरूरत है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि मौसम के नाम पर फैलाए जाने वाले अनावश्यक भय और आर्थिक शोषण से सावधान रहा जाए. एल नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाएं आती-जाती रहेंगी, लेकिन यदि बाजार में डर का कारोबार बढ़ता है तो इसका नुकसान देश के करोड़ों किसानों, उपभोक्ताओं और पूरी अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ सकता है. ऐसे में संतुलित जानकारी, वैज्ञानिक सोच और मजबूत बाजार निगरानी ही सबसे प्रभावी समाधान साबित हो सकते हैं.  

क्या है अल नीनो और क्यों होती है चिंता?

अल नीनो प्रशांत महासागर के सतही जल के गर्म होने से जुड़ी एक प्राकृतिक मौसमीय घटना है. इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है. भारत में आमतौर पर एल नीनो को कमजोर मॉनसून और कम बारिश से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि हर अल नीनो वर्ष में सूखा पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है.

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियां लगातार मौसम की निगरानी करती हैं और समय-समय पर पूर्वानुमान जारी करती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि मौसम पूर्वानुमान जरूरी हैं, लेकिन उन्हें संतुलित तरीके से समझने और प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है.

इसे भी पढ़ें: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में स‍िस्टम का 'चहेता' क्यों?

इसे भी पढ़ें: जिस हर्ब‍िसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?

MORE NEWS

Read more!